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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

              *९२*

*विपत्ति के अवसर पर भी भगवान का सहारा मत छोड़िये* 

         प्रारब्ध का फल होकर ही रहेगा, टाला नहीं जा सकता है। भगवान देख पायें बात दूसरी है, वे सर्वसमर्थ, चाहे सो कर सकते हैं। किंतु नश्वर शरीर के लिये भगवान् को कहना अल्पज्ञता है। दुःख के समय मनुष्य प्रायः चंचल हो जाया करता है, उस समय वह भक्ति के सुन्दर भावों को पल्लवित करने में कठिनता का अनुभव करता है। परंतु बुद्धिमानी इसी में है कि कठिन विपत्ति के अवसर पर भी भगवान का सहारा छोड़कर मनुष्य किसी दूसरी ओर न दौड़े-मुड़े। भगवान् के सिवा मनुष्य यदि किसी भी दूसरे की शरण लेता है तो समझना चाहिये कि भगवान पर उसकी श्रद्धा नहीं है।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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