1सर्वत्र प्रभु का ही विलास
*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
*१*
*सर्वत्र प्रभु का ही सच्चिदानन्दमयी विलास निरन्तर चल रहा है।*
जब सर्वत्र प्रभु का ही सचिदानन्दमयी विलास निरन्तर चल रहा है, उनकी सच्चिन्मयी लीला के अतिरिक्त यहाँ कुछ भी नहीं है, तब हमें प्रतिकूलता की अनुभूति क्यों होनी चाहिए? क्या अनन्त दयामय प्रभु में इतना विवेक नहीं है कि वे हमारे लिए, अपने शिशु के लिए कोई ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देंगे, जो परिणाम में सुखद न हो? माँ के द्वारा अपने बच्चों के लिए कोई ऐसी चेष्ठा होती है क्या जो उन्हें दुख में डालने वाली हो? माँ तो भूल कर भी सकती है, क्योंकि वह सर्वत्र अवस्थित नहीं है, वह सर्वशक्ति-समन्विता नहीं है, उसमें सम्पूर्ण सर्वज्ञता का विकास नहीं हुआ और अहैतुक सौहार्दम्य, सम्पूर्ण विश्व के लिए निरन्तर लहराने वाला सागर भी वह नहीं बन सकी है, किंतु प्रभु में तो ये चारों बातें निरन्तर वर्तमान है। वे हमारे लिए प्रतिकूल परिस्थिति क्यों उत्पन्न करेंगे? प्रतिकूल परिस्थिति उत्पन्न कर हमें दुखी क्यों करेंगे? सचमुच, सचमुच---यह हमारा ही भ्रम है।
वास्तव में कोई प्रतिकूल लगने वाली परिस्थिति हमारे लिए अनन्त अपरिसीम सुख का द्वार खोलने के लिए निर्मित हुई है। उसके कण-कण में ही आत्यन्तिक अनुकूलता है। आस्तिकता के अभाव के कारण ही हम उस अनुकूलता को देख नहीं पाते हैं। परिस्थिति सृष्ट न हुई है और न ही अनन्त काल तक सृष्ट होगी। चाहे तो हम भी विश्वास करके सुखी हो सकते हैं।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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