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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

               *१०*

*सच्चे सुख का दर्शन हम कैसे पा सकते हैं*

       वास्तव में मानव-जीवन का उद्देश्य क्या है ? वह है--सुख। वेदान्त की बड़ी-बड़ी पद्धति के द्वारा लोग सचमुच यह निर्णय करते हैं कि मनुष्य के मन मे यह सुख की वासना है क्यों ? और अंत में यह निर्णय करते हैं कि आत्यन्तिक निरतिशय सुख उसका स्वरूप है। उससे उसे विछिन्नता का भृम हो गया है और उसी से तादात्म्य करना चाह रहा है। इसलिए उसके अंदर सुख की अभिलाषा निरन्तर बनी हुयी है।

     जिस क्षण से सुख-दुख का अनुभव करने वाली हमारी बुद्धि जागरूक हुयी होगी, तब से लेकर आज तक जितनी चेष्ठाएँ हमने की हैं, उसके अन्तराल में आत्यन्तिक निरतिशय स्वरूपभूत सच्चिदानन्दमय उस सुख के तादात्म्य-लाभ करने की अभिसंधि ही रही है, परन्तु अनादि अज्ञान के कारण हमारे जीवन में भी यही होता आया है कि जो सुख का मूल उद्गम है, सुख का मूल स्रौत्र है, जो वास्तव में हमारा स्वरूप ही है, वह तो हमारा साधन बन जाता है और साध्य बन जाते हैं-जगत के कोई-न-कोई अनित्य कल्पित सुख।

    कदाचित उस स्थिति से हम ऊपर उठ सकते--अपना सारा विवेक बटोरकर श्रीकृष्ण को साध्य-तत्व बना लेते, तो आज तक हम सचमुच-सचमुच पृथ्वी के सर्वाधिक सुखी प्राणियों में होते। वास्तविक सुख की उपलब्धि हो जाती हमें तथा सारे अभाव सर्वथा समाप्त हो जाते और जीवन में कुछ भी शेष न रह जाता प्राप्त करने के लिए। देर-सबेर हमको इस धरातल पर आना ही पड़ेगा अर्थात *श्रीकृष्ण को साध्य-तत्व बनाना ही पड़ेगा और जो कुछ भी श्रीकृष्ण के अतिरिक्त वस्तु प्रतीत होती है--धन, जन, परिवार आदि , उनको साधन बनाना पड़ेगा और तभी हम सचमुच सच्चे सुख के दर्शन पा सकेंगे।*

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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