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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*सकाम उपासना करने वाले को भी भगवत्प्रेम प्राप्त होता है*
महाप्रभु चैतन्य ने कहा है--'जिस तरह नदी के प्रवाह में अनन्तकाल से बहता हुआ कोई तिनका किनारे लग जाता है, वैसे ही अनादिकाल से संसार की नाना योनियों में भ्रमण करता हुआ कोई जीव किसी अत्यन्त भाग्यबल से निस्तार पा जाता है।’ श्रीमद्भागवतमें भी ठीक इसी प्रकार का भाव व्यक्त किया गया है--
*मैवं ममाधमस्यापि स्यादेवाच्युतदर्शनम्।*
*हियमाण: कालनद्या क्वचित्तरति कश्चन ।।*
'हे विभो! निराभिमानी पुरुष केवल आपके चरणों की सेवा ही आपसे माँगते है, सो मैं भी वही वर आपसे माँगता हूँ और कोई भी वासना मुझे नहीं है। हे हरि! जो मुक्ति देने वाले आप हैं, उनको आराधना द्वारा प्रसन्न करके कौन विवेकी पुरुष, जिनसे आत्मा का बन्धन हो, वे आपसे भोग माँगेगा ? अथवा यह विचार करना भूल है। यद्यपि मैं अधम हूँ, तथापि अच्युत के दर्शन मुझे प्राप्त ही होगे। जैसे नदी में बह रहे तृणों में कोई तृण किनारे लग जाते वैसे ही काल के प्रवाह में कर्मवश बह रहे जीवों में कोई जीव कभी पार पहुँच जाते हैं।अतएव कृष्ण का दर्शन मिलना और उसके द्वारा संसार के पार पहुँच जाना मेरे लिये असम्भव भी नहीं है।'
आगे प्रश्र कहते है कि उन निस्तार पाने वाले के निम्न लक्षण जान लेने चाहिये। 'किसी पुण्य-बल से जब किसी के संसार का अन्त होने वाला होता है जिसका निस्तार निश्चित हो जाता है, उसे साधु-संग की प्रति होती है और उसके फलस्वरूप उसकी श्रीकृष्ण में रति उत्पन्न होती है।' भागवत में राजा मुकुन्द भी श्रीभगवानसे यही कहते हैं--
*भवापवर्गो भृमतो यदा भवेज्जनस्य तर्ह्यच्युत सत्समागम:।*
*सत्संगमो यहि तदैव सद्गतौ परावरेशे त्वयि जायते मति:।।*
(१०/५१/५४)
उपर्युक्त बातें सहज में ही समझा जा सकता है कि दयामय की आप पर कितनी कृपा है। आप अपने जीवन की समस्त घटना को आखिरी अन्त तक एक बार के लिये विचार कर देखें। भगवान ने आपको कहाँ से लाकर कहाँ रखा है। आप अपने को हीन समझते हुए भी, 'भगवान की कृपा का पात्र हूँ,--यह समझकर, अत्यन्त भाग्यशाली भी समझकर देखें। हम लोगों से संसार में करोड़ों मनुष्य हैं, किंतु कितनों के पास सच्ची या झूठी भगवान से मिलने की इच्छामात्र भी है। आपमें यह इच्छा तो हो गयी है कि प्रभु के पास पहुँचें। यह क्या कम है ? जहाँ तक मेरा अनुमान है, आपकी उपासना भगवत्प्रेमके लिये ही है। अपनी प्रार्थना में भी आप भगवान से भक्ति की ही
याचना करते होंगे। यदि आपकी उपासना किसी अंश में सकाम भी होगी, तो भी आपको भगवत्प्रेम मिलेगा।
चैतन्य महाप्रभु ने कहा है--
अन्यकामी यदि करे कृष्णेर भजन
कृष्ण तारे देन स्वचरण।।
कृष्ण कहे आमाय भजे, मागे विषय-सुख
अमृत छड़ि माँगे विष, एइ बड़ मूर्ख।
आमि विज्ञ एइ मूर्ख विषय सुख केन
दिव तब चरन दिया विषय-सुख भुलाइव।।
अर्थात् सकाम भाव से भी कोई कृष्ण का भजन करता है तो भी कृष्ण तो उसको अपना चरण ही देते हैं। श्रीकृष्ण सोचते हैं कि यह मेरा भजन तो करता है, पर माँगता है विषय-सुख--अमृत का परित्याग कर विष लेना चाहता है। ओहो! यह बड़ा मूरख है। किंतु मैं तो मूर्ख नहीं, मैं तो सब कुछ जानता हूँ, मैं इसे विषय-सुख देकर ठगने का काम क्यों करूँ,मैं तो इसे अपना चरण देकर इसका विषय-सुख भुलाते हुए इसके
अंदर सच्चा अनुराग उत्पन्न करूँगा।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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