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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*अधिक-से-अधिक भगवान का नाम लिया करें*
भगवान् आज भी अपने भक्तों को उनके भावनानुसार कृतार्थ करने के लिये तैयार हैं। निष्काम भक्तों को प्रेमदान एवं दर्शनों के द्वारा तथा सकाम भक्तों को उनकी वांछित वस्तु देकर भगवान् आज भी कृतार्थ करते हैं। हमारा विश्वास उठ गया है, जिसके कारण हम लोगों की तबाही है। भगवान पर श्रद्धा नहीं रही, अन्यथा भगवान् बिना किसी भेद-भाव सबको स्वीकार कर सकते हैं। इसीलिये मैं बारंबार आप लोगों से एक ही प्रार्थना किया करता हूं कि अधिक-से-अधिक भगवान का नाम लिया करें। बड़े-बड़े संत-महात्माओं का यह अनुभव है कि जो जितना अधिक भजन करेगा, वह उतनी ही शीघ्रता से भगवान की ओर बढ़ेगा। भगवान में श्रद्धा प्रेम होकर जल्दी-से-जल्दी उन्हें प्राप्त किया जा सके, इसका एकमात्र उपाय इस युग के लिये है--नाम का आश्रय। इसलिये फिर भी यही प्रार्थना है कि चाहे हठ से ही क्यों न हो, वाणी का संयम कर और आवश्यकता भर बोलेने के बाद बाकी का सब समय नाम-जप में लगायें। जैसे-जैसे अन्तःकरण पवित्र होगा, वैसे-वैसे अपने-आप भजन में प्रेम होने लगेगा। भजन प्यारा लग जाने पर फिर भजन के लिये चेष्टा नहीं करनी पड़ेगी, अपने-आप भजन होगा। जब तक ऐसा न हो, तब तक हठ से, विचार से-जैसे भी हो, अधिक-से-अधिक नाम जपें। भगवान की कृपा आपके साथ है। आप लोग चाहेंगे तो भगवान की कृपा से भजन अवश्य कर सकेंगे। देखें,भगवान केवल कहने-सुनने की वस्तु नहीं हैं। सचमुच साधना का क्रियात्मक प्रयोग करके उन्हें प्राप्त करने में ही जीवन की सार्थकता है। यह केवल सार वस्तु भगवान ही है। भगवान के लिए ही परिवार बन्धु भाई-सब हों।भगवान के मार्ग में रोकने वाली वस्तुएँ सर्वथा त्याज्य हैं--
जाके प्रिय न राम बैदेही।
तजिये ताहि कोटि वैरी सम जद्यपि पर सनेही ।।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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