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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*भगवान के चरणों में अपने आपको समर्पित करने की सच्ची चाह जाग्रत करें*
स्मर्तव्य: सतत विष्णुर्विस्मर्तव्यो न जातुचित्।
सर्वे बिधिनिषेधाः स्युरेतयोरेव किंकराः।। (पद्म/उत्तर ७२, १००)
बस, मनुष्य-जीवन की सार्थकता इसी में है कि निरन्तर श्रीभगवान को स्मरण किया जाय। उपर्युक्त वचन महर्षि श्रीवेदव्यास के हैं, जिनके वचन त्रिकाल-सत्य हैं। वे कहते हैं कि शास्त्र में जितनी विधियाँ हैं अर्थात् 'ऐसा करो' और जितने निषेध हैं अर्थात् ‘ऐसा नहीं करो, सबका अन्तर्भाव सबका पर्यवसान इसी में है कि निरन्तर भगवान को याद रखो और कभी भगवान को मत भूलो।
हम लोगों ने अनन्त जन्मों में अनन्त बार परिवार इकट्ठे किये,अनन्त बार गृहस्थी की, अनन्त बार ‘मेरा-मेरा' कहकर अनन्त प्राणियों का मोह-जाल बाँधा, किंतु किसी भी जन्म में एक बार के लिये भी हृदय से सच्चे मन से श्रीभगवान को मेरा कहकर नहीं पुकारा, वरण नहीं किया। यह यदि किया होता तो फिर अब हमारी यह दशा नहीं होती। इसलिये इस बार अब भूल न करें। हृदय की सारी शक्ति लेकर उनके चरणों में अपने आपको समर्पित करने की सच्ची चाह जाग्रत करें। फिर प्रभु कृपामय हैं, वे देखेंगे कि ये सब अपनी नीयत भर बाज नहीं आ रहे हैं, इन्होंने अपनी पूरी शक्ति लगा दी है, इसलिये अब मैं इन्हें सँभाल लूँ । जिस दिन अर्न्तहृदय की सच्ची चाह का प्रतिबिम्ब श्रीभगवान के हृदय में पड़ा कि उसी क्षण प्रतिक्रिया होगी, उनका संकल्प होगा और सब तत्क्षण उनके चरणों मे पहुँच जायँगे।
*परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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