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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*हम कहीं भी रहें, किसी भी अवस्था मे रहें, भजन को पकड़ें*
माता देवहूति जी कहती हैं---
*अहो बत श्वपचोअ्तो गरीयान् यज्जिह्वग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्।*
*तेपुस्तपस्ते जुहुव: सस्नुरार्या ब्रह्मनूचुर्नाम गृहन्ति ये ते।* (श्रीमद्भा. ३/३३/७)
'बड़े आश्चर्य की बात है--जिसने तुम्हारा नाम लिया, उसने सारी तपस्या कर डाली, हवन कर लिए, तीर्थ स्नान कर लिया, वेद-पारायण कर लिया एवं उसने सभी आर्यगुणों का संचय कर लिया। इसलिए जिसकी जीभ पर तुम्हारा नाम है, वह चाण्डाल होने पर भी अत्यन्त पूज्य है।'
इस श्लोक से यह बात मन मे कई बार आती है कि सचमुच कलियुग के अनर्थकारी वातावरण में पड़कर हम लोगों ने शास्त्रों पर श्रद्धा खो दी; अन्यथा श्रीमद्भागवत के एक बार पढ़ लेने पर भी भगवान का नाम कैसे छूटना चाहिए। यह वचन अर्थवाद नहीं है। इनको कहने वाली स्वयं भगवतज्जननी हैं एवं जगत पर प्रकट करने वाले महाऋषि वेदव्यास हैं। किंतु समय के फेर से हम इसे पढ़कर भी नहीं पढ़ते, सुनकर भी नहीं सुनते।
मन कभी-कभी विचित्र तरह से धोखा देता है। भजन में लगना चाहता नहीं, इसलिये अनेक युक्तियों से मनुष्य को प्रलोभित करता है। मन तीर्थ करने की सलाह देता है, बड़ी-बड़ी आडम्बरपूर्ण चेष्टाओं के द्वारा उपासना के लिये प्रेरित करता है, तपस्या का नया नया रूप लाकर सामने रखता है, दया एवं धर्माचरण की नयी-नयी योजना उपस्थित करता है, किंतु एकनिष्ठ होकर निरन्तर भजन की सलाह बहुत कम देता है जिस एक भजन से सर्वस्व की सिद्धि अत्यन्त सुलभता से होती है, उसमें प्रवृत्त नहीं होने देता। इसलिये महात्मा पुरुष कहते हैं--‘सावधान रहो, भजन को मुख्य बनाओ, और सारे कर्मो को गौण रखो।'
उपर्युक्त कथन का यह अर्थ नहीं हैं कि तीर्थ नहीं करना चाहिये। यदि सम्भव हो तो अवश्य करना चाहिये। श्रद्धापूर्वक एवं पापरहित तीर्थाटन अत्यन्त हितकर होता है। किंतु यदि हमें भगवान ने ऐसी परिस्थिति में रखा हो, जहाँ तीर्थाटन सुगम न हो, बड़े-बडे पुण्यकर्मो का आचरण कठिन हो तो इससे हताश होने की कोई बात नहीं है। सबका फल हमें मिल जायगा, यदि हमने ठीक भजन किया। तीर्थ में तीर्थापन क्या है, यह विचारें। किसी भी धर्म, किसी भी सम्प्रदायका कोई भी तीर्थ क्यों न हो, उसका तीर्थपन दो बातों के कारण ही है— (१) या तो भगवान ने वहाँ साक्षात् कोई लीला की है अथवा (२) किसी संत ने उपासना की है (उपासना का प्रकार भिन्न-भिन्न हो सकता है)। अतः यदि हमने ठीक जैसा चाहिये वैसा भजन किया तो प्रभु हमें कृतार्थ करने के लिये अवतीर्ण होकर एक नये तीर्थ का निर्माण कर सकते हैं। इसलिये हम कहीं भी रहें, किसी भी अवस्था में रहें, भजन को पकड़े। मन नहीं लगता, कोई बात नहीं, जीभ के द्वारा भगवान के नाम का आश्रय लें--जिह्वाग्रे, नहि मनसः अग्रे। इस भजन से ही जगन्नियन्ता सर्वेश्वर हमारे पास आ जायँगे, आ ही नहीं जायेंगे, बल्कि सर्वेश्वर, सर्वस्वतन्त्र होकर भी भजने वाले के अधीन हो जायँगे।।
*सुमिरि पवनसुत पावन नामू।*
*अपने बस करि राखे रामू।।* (मानस १/२५/३)
यह सर्वथा सत्य सिद्धान्त है।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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