106

*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

        *१०६*
 
*निराश होना प्रभु के प्रेम का तिरस्कार करना है।*

             प्रभु की बड़ी कृपा है; सच मानिये, हम लोग उनकी कृपा में स्नान कर रहे हैं डूबे हुए हैं। फिर घबराये क्यो ? यह बात बिल्कुल याद रखने की है कि एक क्षण के लिये भी निराश होना, अर्थात् ऐसा सोचना कि 'मेरा क्या होगा' उनकी कृपा का-- उनके अहैतुक प्रेम का तिरस्कार करना है। यह कहना हो सकता है मैं उन्हें प्रभु मानता तो बात ठीक थी, पर मैं तो उन्हें प्रभु ही नहीं मानता। प्रभु मानकर उनके आश्रित ही नहीं हूँ, फिर वे मुझे क्यों सँभालेंगे ? बहुत ठीक, पर उन्होंने स्वयं गीतामें कहा है-- *सुहृदं सर्वभूतानाम्*-- सब भूतों का सुहृद हूँ। क्या हम भूतों की श्रेणी में नहीं हैं। यदि वे *'भजतां सुहृदम्'* भजन करने वाले के सुहृद' होते तो हमारे लिये ही निराशा की बात थी, पर वे तो स्पष्ट कहते हैं कि मैं सब प्राणियों का सुहृद हूँ। केवल भजन करने वालों का ही नहीं। फिर उन परम सुहृद को, जो सर्वलोकमहेश्वर भी है, हमारी सुधि नहीं होगी ? अवश्य होगी, ऐसा दृढ विश्वास करे; यह विश्वास दृढ़ हुआ कि सब साधन अपने-आप अनुकूल हो जायेंगे। बिना किसी परिश्रम के उनका संयोग पाकर हम कृतार्थ हो जायेंगे। यह बात बिल्कुल ठीक होने पर भी अन्तःकरण की मलिनता हो इस प्रकार अविश्वास में हेतु है। इस अविश्वास को आप दूर कर सकते हैं, बड़ी आसानी से दूर कर सकते हैं, भगवन्नाम का आश्रय ले लीजिए। दृढ संकल्प करके, उन्हीं की कृपा का आश्रय करके, जीभ निरन्तर नाम ले इसकी पूरी चेष्टा कीजिये। जब तक ऐसा समझ में नहीं आता है कि निरन्तर नाम का स्मरण ही होता रहे, तब तक के लिये नियम कर लीजिये कि कामभर बोलूँगा, कम-से-कम बोलकर काम चलाने की चेष्टा करूँगा, बाकी समय प्रभु के नाम में बीतेगा। बस, इतना ही मेरे हृदय के प्रेम से लपेटी हुई प्रार्थना है। जिस दिन नाम-जप निरन्तर होने लग जायगा फिर कोई कर्तव्य नहीं रहेगा।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

Comments

Popular posts from this blog

92

90

157