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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*जागतिक प्रेम का पर्यवसान श्रीभगवान में होना चाहिये।*
जिस प्रेमसे हम लोगों ने अपने जीवन के इतने दिन बिताये, उस प्रेम का पर्यवसान श्रीभगवान में होना चाहिये, तभी वास्तविक रूप में हम लोगों के प्रेम की सार्थकता है। जगत में किसी के प्रति भी यदि हमारा प्रेम है, किंतु बीच में भगवान् नहीं हैं, तो वस्तुतः वह प्रेम दुःखान्त ही होता है। जगत् में आज इतना दुःख, दैन्य, निराशा, विश्वासघात, स्वार्थपरता और नृशंसता आदि इसलिये ही बढ़ रहे हैं कि श्रीभगवान से रहित चेष्टा होने लगी है, अर्थात् किसी भी चेष्टा का तात्पर्य भगवान की प्रसन्नता नहीं है। भगवत्प्रसन्नता की बात तो दूर, ‘भगवान् हैं' --यह विश्वास भी अधिकांश मनुष्य खोते चले जा रहे हैं। ‘प्रेम' के नाम पर आत्मेन्द्रिय-प्रीति की वासना काम करती है। इसलिये हम लोगों को इस सम्बन्ध में बहुत सावधान रहने की जरूरत है।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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