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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

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*अंतःकरण की स्वच्छता के तारतम्य से ही सत्य के प्रकाश का तारतम्य होता है*

          महात्मा लोगों से आपने कितनी बार सुना होगा---'अणु-अणु में प्रभु विराज रहे हैं, ऐसी कोई जगह नहीं है, जहाँ वे न हों।  महात्मा लोग केवल ऐसा कहते हैं, ऐसी बात नहीं है, उन्हें अणु-अणु में प्रभु के दर्शन होते हैं। पर क्या हम लोग उनके इस कथन का पूरा-पूरा मर्म ग्रहण कर पाते हैं ? यदि ग्रहण कर पाते तो तत्क्षण हमें भी अणु-अणु में प्रभु का दर्शन होने लग जाता। ऐसा क्यों नहीं होता ? अर्थात् अणु-अणु में प्रभु हैं--इस कथन का मर्म ग्रहण होकर प्रभु का दर्शन क्यों नहीं होने लग जाता ? इसका वास्तविक कारण तो प्रभु जाने पर महात्मा लोग स्थूल कारण बतलाते हैं कि अन्तःकरण में सामर्थ्य नहीं है कि वह सत्य के मर्म को ग्रहण कर सके। अन्तःकरण मलिन है।अंतःकरण की स्वच्छता के तारतम्य से ही सत्य के प्रकाश का तारतम्य हो जाता है। सत्य वस्तु एक होते हुए भी ग्रहण-शक्ति के तारतम्य से अनुभव का भी तारतम्य हो जाता है।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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