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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

        *१०९*

*भगवान् पर निर्भर होने की चेष्टा कीजिये*

       अधिक-से-अधिक भगवान पर निर्भर होन की चेष्टा कीजिये। सबसे निरापद एवं पतन के भय से सर्वथा शून्य यह मार्ग है। इसपर दृढ़ विश्वास करते रहना चाहिये--भगवान हैं वे हमारे हैं और हमारा मंगल ही करते हैं।

         अपनी पसंदगी मन से सर्वथा निकाल दीजिये। हमारी बुद्धि प्राकृत है अज्ञान से भरी हुई है  पापों के संस्कार से मलिन है, बहुत कम दूरी की बात सोचती है। बहुत बार हम लोग उस बात में अपना मंगल मान लेते हैं, जिस बात से हमारी अत्यन्त हानि होने वाली होती है, पर भगवान की बुद्धि भगवन्मयी है, वहाँ भूल होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। वे हमारे लिये जो कुछ भी सोचते हैं, या सोचेंगे, उसमें हमारा अनन्त मंगल है और उन्हीं की पसन्दगी हमारी पसंदगी होनी चाहिये। भगवान पर निर्भर करने वाले भक्त को यह सदा के लिये मान लेना चाहिये कि उन्होंने (भगवान) जिस परिस्थिति में हमें रखा है, वही उन्हें (भगवान )को मंजूर है। यदि उन्हें मंजूर न होती तो परिस्थिति अवश्य बदल जाती। ऐसा विश्वासी भक्त सारी चिंताओं से मुक्त होता है। चिंता होती है तो इस बात की कि कहीं हमारी निर्भरता में दोष नहीं आ रहा है--हम कहीं उन्हें छोड़कर अन्य साधनों पर अन्य उपायों पर तो निर्भर नहीं कर रहे हैं। भगवान की चाह भी उन्हीं पर छोड़ देनी चाहिये। भगवद दर्शन शीघ्र-से-शीघ्र हो, इसका सर्वोत्तम उपाय है कि इस बातों को भी उन्हीं पर छोड़ दें, अत्यन्त व्याकुल हो जाना बह दूसरे नम्बर बात है।

           जगत का प्राणी यह चाहता है कि हमारे पास जो हैं वह बना रहे और जो नहीं है वह मिल जाए। इसी के लिए सारा संसार भटकता है पर यदि प्राणी भगवान पर निर्भर हो सके तो उसके लिए सब बातों पर भार स्वयं जगतपति वहन करेंगे जब वे स्वयं योग क्षेम चलायेगे तब वह योगक्षेम कितना सुंदर होगा--इसकी कल्पना भी हमारा मलिन मन नहीं कर सकता। वह तैयार हैं और हम से इसके बदले में चाहते हैं कि हम इस दुखालय संसार का चिंतन छोड़ कर, उनका चिंतन करें। कोई कहे--तुम दु:ख की चिन्ता छोड़ दो, अपनी जलन मिटा दो, मैं तुम्हारा सब काम कर दूँगा, फिर भी ऐसा सौदा वह भी स्वयं जगतपति के साथ ना करने वाला मूर्ख है। यह बातें भावुकता की नहीं है ध्रुव सत्य है। विश्वास करके आप अपने मन को पारिवारिक तथा अन्य सभी चिंताओं से खाली करके, प्रभु का चिन्तन कीजिए। आप देखेंगे कि इतनी सुंदर ढंग से आपकी लौकिक एवं परमार्थिक सभी समस्याएँ हल होंगी कि आप मुक्त हो जाएँगे। केवल उन पर निर्भर होकर चलने की जरूरत है। प्रमाण तो पद-पद पर मिल जाएगा। इस निर्भरता की परीक्षा होती है। अनुकूल परिस्थितियों में तो ऐसा भ्रम हो सकता है कि प्रभु इच्छा में हमें पूर्ण संतोष है, परन्तु सर्वथा मन के प्रतिकूल परिस्थिति में जब यह भाव स्वभाविक रहे कि 'प्रभु ने बड़ा मंगल किया', तब समझना चाहिए कि निर्भरता हुई। विवेक के द्वारा संतोष करना अर्थात यह मानना कि 'प्रभु जो करते हैं ठीक करते हैं, अन्तर्गत यह भी ठीक ही होगा'-- इस प्रकार से प्रतिकूल परिस्थिति में समाधान करना भी उत्तम है, पर जहाँ संतोष विवेक के द्वारा किया जाता है, वहाँ निर्भरता में कमी है। लाचारी से संतोष करना अर्थात ऐसा मानना कि 'क्या करें, हमारा क्या वश है'-- यह तो निर्भरता में कलंक है।

            वास्तविक रूप में निर्भर होते ही सारे शुभ-अशुभ नष्ट हो जाते हैं तथा सर्वथा नई विधान के अनुसार ही निर्भर भक्तों के जीवन के शेष दिन बीतते हैं। अतः लौकिक दृष्टि से भी अशुभ परिस्थिति जो अशुभ कर्मों के फल से प्राप्त होती है उसके सामने प्राय: नहीं ही आती तथापि किसी-किसी भक्त का सम्मान बढ़ाने के लिए जगत को दिखलाने के लिए कि भगवान का भक्त महान विपत्ति को भी किस प्रकार उनका विधान मानकर सहर्ष स्वीकार करता है, लौकिक दृष्टि से अशुभ परिस्थितियाँ उनकी (भगवान की) इच्छा से आती है ,यद्यपि अधिकांश भक्तों के जीवन में अशुभ परिस्थितियों नहीं आती। यद्यपि अधिकांश भक्तों के जीवन में अशुभ परिस्थितियाँ नहीं आतीं, फिर भी साधक को अपनी ओर से यह दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिए कि मैं प्रतिकूल परिस्थिति में भी उनका विधान मानकर सर्वथा अम्लानचित्त से स्वीकार करूँगा।' बस, सर्वथा सब प्रकार की चिंताओं से रहित होकर भगवान में मन लगाने की चेष्टा कीजिए। यहाँ जो कुछ जैसे भी हो रहा है होने दीजिए और जितनी बार मन संसार के चिंतन में लगे, उतनी बार उसे हटाकर प्रभु में लगाइए। यही साधन करना है--यही साधन करना है। प्रेम आता है कि नहीं ,वृतियाँ सुधरती है कि नहीं, इसकी चिन्ता छोड़ दीजिए। चित्तवृत्ति की धारा निरन्तर भगवान की ओर हो, इतना ही करना है। यदि आप अपनी ओर से पूर्ण शक्ति लगाकर प्रयत्न करेंगे तो भगवान की कृपा से सफलता मिलेगी और बहुत शीघ्र मन भगवान में लग जाएगा।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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