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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*श्रीकृष्ण को जीवन का लक्ष्य बनावें*
हम अपने जीवन का विश्लेषण करके देखें--आज तक सुख पाने का सतत प्रयास जान में,अनजान में हमने किया है पर क्या हम सुखी हो गए? *आजीवन सुख के लिए निरन्तर प्रयत्न करते रहने पर भी, आजीवन सुख की चाह पोषित रख कर भी, आज वर्षों-वर्षों तक सत्संग भजन करके भी हम सुखी नहीं हो सके हैं। ऐसा क्यों ?*
सच्चे हृदय से अगर हम पूछेंगे तो हमको यह स्पष्ट दिखेगा कि श्रीकृष्ण अभी हमारे लिए लक्ष्य बने ही नहीं। हमारी कल्पना से प्रसूत जो सुख की वृत्ति है,श्रीकृष्ण उसके साधन मात्र हैं। पर उनका एक चिन्मय विलास अनादि काल से चल रहा है, अनन्तकाल तक चलता रहेगा। *वे इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि मेरे अमुक स्वजन को क्या चाहिए।* उनके निर्णय में कभी भ्रम का समावेश हो ही नहीं सकता। जैसे हम अपने बच्चे के लिए निर्णय कर लेते हैं और तुरन्त ही उसकी इच्छित वस्तु उसे देने का संकल्प हमारे मन में जता है और व्यवस्था भी करने का प्रयत्न करते हैं; क्योंकि हमारे मन में प्रभु के अनन्त अपरिसीम निरावल प्यार का प्रतिबिम्ब ही आता है, जो बच्चों को प्यार देने के लिए उद्विग्न हो उठता है। *प्यार का ही स्वरूप होता है--सर्वथा सर्वांश में जिसको प्यार करें उसको सर्वथा सर्वांश में सुखी करने का प्रयास करें, सुखी करता रहे।* श्रीकृष्ण के स्वरूप में यह प्यार अनन्त अपरिसीम मात्रा में अनन्त सागर की तरह लहरा रहा है। उसी का प्रतिबिम्ब हमारे मन में जाग्रत होता है और हम अपने बच्चे को सुख पहुँचाने की चेष्टा करते हैं।
किंतु एक वस्तु की चाह पूरे होते ही ,बच्चा दूसरी वस्तु की चाह करने लगा ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है कि वास्तव में जिस वस्तु की माँग उस बच्चे ने की थी उसमें पूर्ण सुख की उपलब्धि उसे नहीं हुई ।तुरन्त ही उसके मन में, अज्ञात मन में ,नवीन सुख की अभिलाषा जगी और उसके अनुसार उसकी माँग फिर हुई। अर्थात *एक नवीन सुख की अभिलाषा, उसकी माँग उसकी पूर्ति और फिर नवीन सुख की अभिलाषा, उसकी माँग और पूर्ति--यह क्रम चलता ही रहा है।*
श्री कृष्ण के प्रति हमारा भी सम्बन्ध ठीक इसी तरह इसी प्रकार बना हुआ है। सुख की अभिलाषा, माँग, फिर, उनके द्वारा उसकी पूर्ति। श्रीकृष्ण लक्ष्य ही नहीं बन सके अभी तक तो।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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