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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

           *११०*

*जिस क्षण आपका हृदय कातर हाकर रोने लगेगा, उसी क्षण प्रभु सुन लेंगे*

         आप भगवान की यह बड़ी भारी कृपा समझे कि आसक्ति आपको आसक्ति के रूपमें दीख रही है। इसका मिटना भगवत्कृपासापेक्ष है। प्रयत्न से यह कम होती है, पर इसके नाश का सर्वोत्तम उपाय है--भगवान के सामने सच्चे हृदय से प्रार्थना जिनके एक संकल्प से विश्व का निर्माण हो जाता है और संकल्प छोड़ते ही सब नष्ट हो जाता है, वे यदि चाहें तो उनके लिये आपके इस दोष का नाश कितनी तुच्छ बात है--यह आप सहज में अनुमान लगा सकते हैं। अर्न्तहृदय की करुण प्रार्थना के द्वारा आप उनमें चाह उत्पन्न कर दें। ठीक मानिये, यदि आप सच्चे हृदय से इस दोष का नाश चाहने लग जाँय तो प्रभु को अवश्य ही दया आ जायगी और क्षण भरमें उनकी कृपा से सारे दोष मिटकर आपका मन उनमें लग जायगा। आप चाहते नहीं हों, यह बात नहीं है, पर अभी चाह बहुत मन्द है। प्रार्थना करते-करते जिस क्षण सचमुच इन दोषों के लिये हृदय में जलन पैदा हो जायगी और आपका हृदय कातर होकर रोने लगेगा, उसी क्षण प्रभु सुन लेंगे। अवश्य ही यह दूसरी श्रेणी की बात है। 'कुछ भी न माँगना सर्वोत्तम है।'

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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