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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

             *११२*

*संसार से मनको हटाकर भगवान् में लगाइये*

           एक बात खूब ध्यान में रखने की है--भगवान के मार्ग में बढ़ने वाले को साथी नहीं खोजना चाहिये। साथ मिल जाय, ले लें, किंतु साथ की अपेक्षा न रखें। खासकर आजकल कलियुग के भीषण वातावरण में संसार के गर्त से निकालने में सहायता देने वाले साथी बहुत कम मिलते हैं।
       
          काल के प्रवाह में आज जिसे मनुष्य अपना कहता है, वे सब-के-सब छिन्न-भिन्न हो जायेंगे। आप ही सोचें--इस जन्म के पहले भी तो आप कहीं थे, परिवार भी होगा; किंतु आज उसकी स्मृति तक नहीं है। वे भूखे मर रहे होंगे तो भी आपको उनका पता नहीं। इसी प्रकार मृत्यु वर्तमान परिवार को स्मृति भी नष्ट कर देगी। पर मोहवश मनुष्य विचारता नहीं। तात्पर्य यही है--संसार से मन को हटाकर भगवान् में लगाना चाहिये। समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। किंतु हताश भी होने की जरूरत नहीं है। कृपामय का आश्रय जिसने वाणी से भी ले रखा है, उसका भी उद्धार वे करेंगे ही। फिर जो उनके चरणों मे मन लगाना चाहते हैं, उनके लिए क्या कहा जाय।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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