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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*भगवान से मनको जोड़िये*
आपका मन जिन-जिन पदार्थों का चिन्तन करता है, उनसे कितने दिनों का सम्बन्ध है, जरा विचारें। इस देह के धारण करने के समय से ही तो उनका सम्बन्ध हुआ है। अतएव एक सीमित समय के चित्र बार-बार मन में उलट-पलट करके आते हैं और किसी से राग होता है, किसी से द्वेष होता है ; किसी को आप अपना मानते हैं, किसी को पराया; किसी से दु:खी होते हैं, किसी से प्रसन्न होते हैं--यही भूल है। हम लोगों को इसी को मिटाना है। इन सब स्थानों से मन को निकालना है और सबके बदले केवल एक भगवान का चिन्तन करना है। हमारे चिन्तन का जितना स्थान भगवान् ग्रहण करेंगे, उतना अंश विषयों से रहित होगा। जिस दिन केवल भगवान्–ही–भगवान् रहेंगे, उस दिन संसार पूर्ण रूप से निकल जायगा। हम लोग अभ्यास करें, चेष्टा करें मन को निरन्तर भगवदाकार बनाने की। पहले विश्वास करें--‘इस जगत में सुख नहीं है, फिर प्रतीति होने पर विचार के द्वारा निश्चित करें--यहाँ सुख नहीं है। इस प्रकार निरन्तर--'यहाँ इस जगत् में सुख नहीं है, इस भावना को दृढ़ करते हुए भगवान से मन को जोड़िये। देखिये, भगवान् कोई कल्पना की वस्तु नहीं हैं। वे हैं, सत्य हैं, नित्य हैं और आपकी प्रत्येक चेष्टा को देखते हैं। यदि सचमुच पूरी ईमानदारी से अपनी ओर से मन को लगाने की पूरी चेष्टा करें तो कृपामय की कृपा शेष कमी पूरा कर देगी। वे केवल नीयत देखते हैं। प्रयास की तत्परता होने पर उनकी कृपा से स्वयं संसार से मन हटेगा और उनकी ओर लगेगा।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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