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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

            *११४*

*व्यवहार जैसेे है, वैसे ही रहे; मन में केवल उनका ही आसन रहे*

      पूरी चेष्ठा कीजिये, मन से और सभी आसक्तियाँ मिट जायें। खूब गम्भीरता से विचारें और बार-बार स्त्री आदि के प्रति मेरा प्रेम होने का क्या कारण है? इसमें एक बडी सुन्दर रहस्य की बात है। आप विचारें--आपका प्रेम आपकी स्त्री आदि की चेतन आत्मा से हैं अथवा उसकी देह से? यदि देह से प्रेम होता, तो मरने के बाद शरीर चेतन आत्मा के निकल जाने के बाद भी उसे रहना चाहिये, पर सच मानिये, यदि आप कहीं जीवित रहें और आपकी स्त्री आदि में किसी की मृत्यु हो गयी और उसके बाद यदि कोई आपको उस कमरे में अकेले रहने के लिये कहे तो डर लगेगा। आप शायद नहीं रहियेगा। ऐसी बात क्यों होती है ? इसलिये कि अब उस में भगवान् का जो चेतन अंश था, वह नहीं रहा। भगवान का अंश निकल जाने पर वह चीज इतनी भयावनी हो गयी कि अब उसके पास बैठने में भी लगता है। उनका अंश जब तक था, तब तक यह चीज प्रिय थी। अब सोचे, उनके अंश को लेकर ही तो आप इतने फँस रहे हैं। यदि स्वयं अंशी पूर्ण रूप से प्राप्त हो जाय तो कितना मधुर लगेगा ? कितना आकर्षण होगा ? स्वयं भगवान् विष्णु ने ब्रहा जी से कहा है--

*अहमात्माऽऽत्मनां धातः प्रेष्ठः सन् प्रेयसामपि।*
*अतो मयि रतिं कुर्याद्देहादिर्यत्कृते प्रियः।।*
             (श्रीमद्भागवत ३/६/४२)
 
          'विधाता! मैं आत्माओं का भी आत्मा और स्त्री-पुत्रादि प्रियों का भी प्रिय हूँ। देहादि भी मेरे ही लिए प्रिय है। अतः मुझसे ही प्रेम करना चाहिए।'

          इन बातों पर खूब विचार कीजिये। व्यवहार जैसे भी हैं, वैसे ही रहें,पर मन को खाली कर दीजिए। मन में केवल उनका आसन रहे। सन्त लोग कहते हैं--ऐसी बात हो सकती है, यदि कोई सच्चे हृदय से चाहने लगे। सच्ची चाह निर्मल अंतःकरण में होती है और निर्मल-अंतःकरण बनने का सर्वोत्तम एवं सुलभ साधन है--निरन्तर नाम-रटन।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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