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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*निराश मत होवें, भगवान् की कृपा की बाट देखते रहें*
आपको अपनी स्त्री आदि की बीमारी की चिन्ता है, सो स्त्री आदिके सम्बन्ध में यह बात विचारना चाहिये कि मंगलमय के विधानके अनुसार जो होना है, वही होगा। उनकी मृत्यु में हमारा मंगल होगा तो मृत्यु आकर ही रहेगी और संयोग से मंगल होगा तो संयोग में कभी नहीं तोड़ेंगे। इसके अतिरिक्त ज्योतिष के निर्णय से अल्पायु एवं दीर्घायु का ठीक-ठीक पता चलना आजकल कठिन है। ज्योतिष शास्त्र ठीक है, पर उसके जानने वाले आज के बहुत कम हैं। सबसे मुख्य बात यह है कि भगवान के विधान को जाना भी नहीं जा सकता। यह सोचकर इस विषय में आपको निश्चिन्त ही रहना चाहिए। आर्थिक प्रश्न को लेकर मन में चिन्ता होनी भी स्वाभाविक है। साथ ही आप जैसे वातावरण में रह रहे हैं, उसमें भगवान् पर विश्वास की शिथिलता होना कोई आश्चर्य नहीं है। पर आप मन में इस बात को निश्चय कर लें कि यह बात सर्वथा प्रारब्ध से सम्बन्ध रखती है। प्रत्येक प्राणी का प्रारब्ध अलग-अलग है। सुख-दुःख जैसे, जिसके प्रारब्ध में हैं, वे आयेंगे ही। पर केवल दुःख बढ़ता है। खासकर आपको तो इन बातों को छोड़ देना चाहिए। आप एवं आपसे सम्बन्ध रखने वाली समस्त वस्तुएँ उनकी (भगवान की) वे चाहे-जैसे उन्हें काम में लायें। यदि विवेक बटोरकर बार-बार मन को इस प्रकार सुझाव (सजेशन) दीजियेगा तो उनकी कृपा से मन इन बातों को ग्रहण करने लगेगा।
देखें, घबरायें बिल्कुल नहीं। उनपर निर्भर होने की चेष्टा कीजिये। वे स्वयं बल देंगे। देर से दें, जल्दी दें, कभी दें, पर देंगे अवश्य। क्षण के लिये भी निराश मत होवें। उनकी कृपा का एक क्षण के लिये अनुभव होने पर स्त्री आदिके प्रति सारा मोह, संसार का सारा प्रलोभन उसी क्षण हवा हो जाएगा। कृपा का अनुभव भी उनकी कृपा से ही होगा। आप बाट देखते रहें। वस्तुतः भगवान की कृपा ऐसी ही होती है कि हम लोग उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। *बस, आवश्यकता भर बोलने के बाद जागने से लेकर सोने तक मशीन की तरह जीभ भगवान का नाम लेती रहे--यह काम अवश्य होना चाहिए। यह हो सकता है; यदि नहीं होता तो समझ लें कि मन आपको बुरी तरह धोखा दे रहा है। सावधान हो जाइये। कम-से-कम आप इतना ही कीजिये, बाकी वे सब कर देंगे, कर देंगे, कर देंगे। सारी व्यवस्था ठीक हो जाएगी, हो जाएगी, हो जाएगी।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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