117
*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
*११७*
*मन से एवं मानसिक देह से अपने प्रियतम की सेवा कीजिये*
भगवान के चरणों की साक्षात् नित्य सेवा जिस देह से होती है, वह देह आपको प्राप्त नहीं है। यह देह पाञ्चभौतिक है, नश्वर है, मल-मूत्र से भरा है, गंदा है। इसकी ओर उपराम हो जाइये। लालसा कीजिये उस देह की,जिसको पाकर नित्य-निरन्तर उनके चरणों में बैठकर उनकी सेवा का सौभाग्य प्राप्त हो। जब तक वह देह नहीं मिलती, तब तक वाणी से, मन से एवं मानसिक देह से उनकी सेवा कीजिये, बड़ी लगन से कीजिये। वही आपका असली धन है। वाणी से प्रियतम का नाम लीजिये, मनसे लालसा कीजिये तथा उस देह की ओर ध्यान रखिये एवं अभ्यास कीजिये कि मन का प्रत्येक संकल्प उनकी सेवा की भावना से सना हुआ हो। उनकी कृपा का आश्रय करके अपनी पूरी ताकत लगा दीजिये। वे देखेंगे और आपकी व्याकुलता देखकर उनके हृदय में अनुराग की लहरें उठने लगेंगी--उनके हृदय में चाह होने लगेगी आपसे मिलकर आनन्द लेने की और आप निहाल हो जायँगे।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
Comments
Post a Comment