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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

             *११८*

*जगत की परिस्थितियों के हेर-फेर को खेल समझकर खेलते चले जाइये।*

            आप शिक्षक हैं और विद्यालय की स्थिति बड़ी विचित्र है, यह माना ; परन्तु विद्यालय ही क्या आपको चाहिये सारे जगत की परिस्थितियों के हेर-फेर को बिल्कुल गौणतम कर दें। भगवान् ने जैसे रच रखा है, वही होगा और उसमें सबका मंगल है। सिनेमा-हाउस में जिस प्रकार रील घूमती रहती है और एक-पर-एक दृश्य बदलते रहते हैं, उसी प्रकार विश्वास रखियेगा कि फिल्म घूम रही है। एक के बाद एक दृश्य आ रहे हैं। बस, इन्हें खेल समझकर देखते चले जाना चाहिये। खूब विश्वास रखिये--जिस फिल्म के ऑपरेटर, संचालक, मैनेजर मंगलमय भगवान् हैं, उसका पर्यवसान किसी के न चाहने पर भी जो होने वाला है, वह होकर ही रहेगा। फिर चिन्ता क्यों करें। चिंता तो, बस, हरिनाम की करनी है। यह बातें केवल कथनमात्र की नहीं है। मनुष्य भगवान पर विश्वास करके इन्हें अनुभव कर सकता है। अतएव किसी भी प्रकार को परिस्थिति में किचिंतमात्र भी विचलित न होकर भगवान की ओर ही बढ़ने की चेष्टा करें।

            एक बात और है। विद्यालय से आपका सम्बन्ध सच पूछे तो यही है कि इसके द्वारा आपकी रोटी का प्रश्न हल होता है। बस, इसके सिवा आपको उससे क्या लाभ है ? थोड़ी देर के लिये कल्पना करें कि परिस्थिति से बाध्य होकर आप लोगों को विद्यालय छोड़ देना पड़े; पर इससे आपका क्या बनता-बिगड़ता है ? विश्वास रखिये--यदि भगवान की मर्जी है कि आप लोगों को भोजनाच्छादन अच्छी तरह से प्राप्त होता रहे तो जगत में ऐसा कोई पैदा नहीं हुआ है, जो इसे बंद कर सके। किंतु यदि उनकी मर्जी है कि आप लोगों को भूखों मरना पड़े तो जगत में ऐसा कोई भी नहीं है, जो आप लोगों को खिला सके। भले ही पूर्ण रूप से न हो, आंशिक रूप से आपने उस सर्वेश्वर की शरण ली है। इस आंशिक शरणागति का मूल्य थोड़ा नहीं है। आप लोगों को भगवान के सिवा और किसी का मुँह जोहने की जरूरत नहीं है।

      सत्य पर स्थित रहियेगा। जगत का प्रलोभन चाहे कितना भी आकर्षक क्यों न हो, सत्य से न हटियेगा। आवश्यकता पड़ने पर मृत्यु स्वीकार कर लेनी चाहिये, किंतु सत्य का आश्रय नहीं छोड़ना चाहिये। जितनी मात्रा में आपके पास दृढ भगवद्विश्वास रहेगा, उतनी ही मात्रा में आप सत्य पर भी दृढ़ रह सकेंगे--यह बात भी ध्यान में रखेंगे।

           आपने जीवन के अन्तिम समय में भगवत्स्मृति होने की बात लिखी है। यह खूब ध्यान रहे कि यदि कोई साधन के बल पर अन्त समय भगवान को याद कर लेने का दावा करे तो मेरी समझ में वह भूल करता है। अन्त समय में भगवत्स्मृति होना एकमात्र भगवत्कृपासापेक्ष है। इसलिये भगवत्कृपाका अवलम्बन करके आप निरन्तर प्रसन्न रहें और यह विश्वास रखें--प्रभु अत्यन्त दयामय हैं, वे मेरी वाचिक शरणागति की अवहेलना नहीं करेंगे। चाहे मैं कितना ही अधम क्यों न होऊँ, अन्त-समय वे मुझे आकर ले जायँगे।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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