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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
           
                *१२* 

*सच्ची चाह होते ही भगवान मिल जायँगे*

      यदि हम किसी दूर स्थित मित्र को याद करें तो उसकी मानसिक मूर्ति तो सामने आ जायगी, पर उसका शरीर यहाँ से बहुत दूर किसी अन्य स्थान में होने के कारण नहीं दिखेगा; परन्तु भगवान में यह बात नहीं है। *भगवान और भगवान का स्मरण दो वस्तु नहीं है।* जिस समय हम भगवान की मूर्ति अपनी मानस पटल पर लाते हैं,उसी समय वहीं पूर्ण रूप से भगवान हमारे मन में आ जाते हैं। पर वे बोलते इसलिए नहीं है कि हम उन्हें भगवान का चित्र मान लेते हैं और थोड़ी देर बाद फिर दूसरे कामों में लग जाते हैं। यदि ठीक से कोई एक लीला का चित्र बाँधकर मन को उसमें डुबोये रखें तो उसी भगवान की मूर्ति में भगवान प्रकट हो जायँगे; क्योंकि भगवान वहाँ पहले से ही हैं। *जब तक मन नहीं लगायँगे तब तक 'मैं भगवान को जानता हूँ'--यह कहना बनता नहीं।* जरा सोचें धन चाहने पर मन उसमें कैसे लगता है? कौन-सी युक्ति मन लगाने की हमने किसी से पूछी थी? नहीं पूछी थी;मनकी स्वाभाविक गति धन की ओर लग रही थी क्योंकि धन की चाहत थी। इसी प्रकार *जहाँ भगवान की चाह है वहाँ मन की गति उस ओर दौड़ेगी।* धन तो चाहने मात्र से नहीं मिलता,उसके लिए ना जाने कितने उद्योग करने पड़ते हैं, फिर उद्योग के सफल होने का भी निश्चय नहीं। पर इसमें तो केवल चाह की जरूरत है। *'हे नाथ! तुम मुझे मिल जाओ'--यह चाह होते ही वे मिल जायँगे।* विचार करें जब भगवान का चिन्तन छोड़कर मन दूसरी चीज पर जाता है, तब उसके लिए भगवान से अधिक मूल्य उस वस्तु का है या नहीं? और जब उसकी कीमत हमारे मन में ज्यादा है तो भगवान क्यों आवें!  *यह सर्वथा सत्य है कि सच्ची चाह उत्पन्न होते ही वह मिल जायँगे*, चाह होते ही भगवान् उस चाह को पूर्ण कर देंगे।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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