120
*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
*१२०*
*भगवान को जीवन में मुख्य वस्तु बनाइये !*
जो हो रहा है, वह ठीक हो रहा है--यों समझकर सदा निश्चिन्त रहना चाहिये। एक क्षण के लिये भी अपना लक्ष्य नहीं भूलना चाहिये। मुझे इस जीवन में भगवान के पास पहुँचना है--अगर इस बात को कभी न भूलेंगे, तो फिर अपने-आप जीवन की सारी चेष्टाएँ भगवान के लिये होने लगेंगी। वस्तुतः यहाँ का कोई भी पदार्थ हमें इसलिये साथ में रखना चाहिये कि उसके सहयोग से भगवान् के मार्ग में अधिक-से-अधिक बढ़ा जा सके। जो पदार्थ हमें भगवान से अलग हटाता हो, वह तो सर्वथा त्याज्य है, चाहे वह कितना ही प्रिय क्यों न हो। यह कोई पढ़-सुन लेने की बात नहीं है, भगवान के इच्छुक भक्तों को सचमुच इसका क्रियात्मक प्रयोग करना पड़ता है। अवश्य ही भगवान् परम दयालु हैं और वे अपने ऊपर निर्भर करने वाले भक्त की सब प्रकार सहायता ही करते हैं, किंतु कभी-कभी प्रेम-परीक्षा के लिये ऐसा अवसर भी मिला देते हैं, जब भक्त को एक ओर भगवान् और दूसरी ओर प्रलोभन--इन दोनों में से किसी एक पथ को चुनना पड़ता है। भगवान के विश्वासी भक्त तो सारे जगत का ऐश्वर्य ठुकराकर भगवान को वरण करते हैं। अतः आपको भी सदा सावधान रहना चाहिये, जिससे भगवान् ही जीवन में मुख्य वस्तु हों और उनके लिये यदि आवश्यकता हो तो सब कुछ छोड़ दिया जाय।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
Comments
Post a Comment