122
*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
*१२२*
*श्रीकृष्ण के प्रति आसक्ति बढ़ाइये*
पाँच-पाँच मिनट पर भगवत्स्मरण की चेष्टा करते हैं, पर भूल हो होती है तो इस विषय मे यह निवेदन है कि भूल होती है तो होने दें, पर चेष्टा करते ही चले जायँ। जब तक श्रीकृष्ण प्यारे नहीं लगते, तब तक भूल होगी ही। यह नियम है, सबसे प्यारी चीज भूलती ही नहीं। श्रीकृष्ण से अधिक प्यारी चीज और कोई होगी, जिसके लिये श्रीकृष्ण को भूल जाते हैं। श्रीकृष्ण को याद करते-करते अपने-आप सब आकर्षण फीका पड जायगा और वे सबसे प्रिय लगने लगेंगे। फिर भूल नहीं होगी।
भावपूर्ण पुकार सच्चे मन से नहीं होती, यह ठीक है, पर इससे यह स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण की अभी पूरी आवश्यकता नहीं प्रतीत हुई है। प्यासे को पानी की पुकार के लिये कहीं सीखने नहीं जाना पड़ता, अपने-आप पुकार होती है; क्योंकि पानी उसके लिये अत्यन्त आवश्यक वस्तु है। वैसे ही श्रीकृष्ण जिस दिन परमावश्यक वस्तु बन जायेंगे, उस दिन सच्चे मन से उनके लिये पुकार होने लगेगी। श्रीकृष्ण को याद करते-करते वे अपने आप आवश्यक बन जायँगे। फिर पुकार होगी।
भागवत सप्ताह-पाठ के समय नाम-जप कम हुआ तो कोई बात नहीं। श्रीमद्भागवत तो भगवान का स्वरूप ही है। नाम एवं पाठ दोनों ही भगवद्रूप हैं। कोई-सा हो, निरन्तर होना चाहिये। मन में खाने-पीने की आसक्ति है, इससे चिन्तित मत होइये। बस, श्रीकृष्णके प्रति आसक्ति बढ़ाइये। श्रीकृष्ण की आसक्ति मोक्ष-सुख से भी वैराग्य उत्पन्न कर देती है, खाने-पीने की आसक्ति तो तुच्छातितुच्छ बात है।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
Comments
Post a Comment