125

*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

               *१२५*

*भगवान् के कृपामय स्पर्श की प्रतीक्षा कीजिये*

           एक बात ध्यान में रहनी चाहिये कि यदि लेशमात्र भी आकर्षण भगवान् के अतिरिक्त किसी और जगह होता है तो समझ लेना चाहिये, हम भगवान के शरण हुए ही नहीं। वास्तविक शरणागति हो जानेपर आसक्ति का सर्वथा अभाव हो जाता है। किंतु घबराना नहीं चाहिये। जिस दिन साधक की यह अभिलाषा हृदय से सम्बद्ध हो जाती है, उसी क्षण भगवान् शरणागति स्वीकार कर लेते हैं। एक बात और है। जिस पर भगवान की अत्यधिक कृपा होती है, जिसे भगवान् अपने पास बुलाना चाहते हैं, वस्तुतः वही इस मार्ग में वाचिक शरणागति भी ग्रहण करता है। देखें, आपकी इच्छा पूरी भी हो सकती है और नहीं भी पूरी हो सकती ; किंतु यह वाचिक शरणागति एक दिन उन्हीं की दया से सच्ची शरणागति में परिणत हो जायगी। आप भगवान् की दया का अलौकिकता का अंदाज नहीं लगा सकते। मानवी बुद्धि भगवान की दया कैसी होती हैं, इसको नहीं समझ सकती। यही कारण है कि अपने माप (स्टैंडर्ड) से ही हम भगवान को जाँचते हैं और दुःखी रहते हैं। अतः सब प्रकार की चिन्ता छोड़कर उस दिन की प्रतीक्षा करते रहें, जिस दिन भगवान के कृपामय स्पर्श का अनुभव करके आप कृतार्थ होने वाले हैं।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

Comments

Popular posts from this blog

92

90

157