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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

              *१२७*

*'नींद तोहि बेचूँगी, आली !*

    एक भक्त का पद है, जिसकी प्रथम पंक्ति है--

 *‘नींद तोहि बेचूँगी, आली ! जो कोई गाहक होय।*

            इस पर विचार करें। प्रेमरसभावितमति व्रजसुन्दरियाँ अपना व्यावहारिक ज्ञान यहाँ तक खो बैठती हैं कि उन्हें प्रतीत होने लगता है--नींद भी खरीद-बिक्री की एक वस्तु है। वास्तव में तो तमोगुण से उत्पन्न होने वाली निद्रा श्रीकृष्ण की स्वरूपभूता ब्रजसुन्दरियों को स्पर्श ही नहीं कर सकती। अपने प्रियतम श्रीश्यामसुन्दर के चिन्तन में वृत्तियों के सर्वथा तन्मय हो जाने पर वे आत्मविस्मृत हो जाती हैं, इस आत्मविस्मृति को ही वे निद्रा मान लेती हैं। सुषुप्ति की भाँति अज्ञान में उनकी वृत्तियाँ लीन हों, ऐसी उनकी निद्रा नहीं। उनकी चित्तभूमि में तो सोते समय भी नित्य-निरन्तर अखण्ड श्रीकृष्ण स्फुरण होता ही रहता है--

*चलत, चितवत, दिवस जागत, सुपन सोवत रात।।*
*हृदय तें वह स्याम मूरति छिन न इत–उत जात ।।*

            ऐसी अनोखी निद्रा में ही एक गोपी विभोर थी--प्रियतम श्रीकृष्ण के चिन्तन में अपने-आपको भूली हुई शयन–पर्यंक पर अवस्थित थी। उसी समय लीलाविहारी आये, सर्वथा समीप तक आये। उन्होंने गोपीको देखा, वे उसके पास कुछ क्षण खड़े रहे, पर उसे उन्होंने जगाया नहीं । बल्कि मिलनोत्कण्ठा बढ़ाकर अधिकाधिक सुख देने के उद्देश्यसे वे लौट गये, उनके लौटते ही व्रजसुन्दरी के हृदय-तन्तु उन्हीं से नित्य जुड़े रहने कारण खिंच-से गये, व्रजसुन्दरी भाव-समाधि से जाग उठी। अभी भी प्राणनाथ तन्तुओं को आकर्षित करे रहे थे। इसीलिये गोपी व्याकुल होकर प्रांगण की ओर दौड़ पड़ी। वहाँ देखा--विखरे हुए गुलाल पर चक्र, छत्र यव, अंकुश, ध्वज आदि चिहोंसे युक्त प्रियतमके पदतल अंकित हैं। अब तो गोपी के दुख का पार नहीं--'आह ! प्रियतम आँंगन में आये और लौट गये, और तुम री नींद ! अरी बैरिन !! मुझे सुलाये रखा ? री तुझे लज्जा नहीं आती ? तू मेरी सखी थी न ? मेरी व्यथा हरने आया करती थी और इसी के मूल्य में तुमने मेरे प्रियतम के दर्शन–सुख को हर लिया ! क्यों ? ठीक है न ? अच्छा बात है। सखी ! मैंने भर पाया ! अब तू यहाँ से जा। नहीं, नहीं ठहर जा, यों तू पुनः मेरे पास आ जायगी। इस वृन्दावन में तूझे पूछता ही कौन है, लौटकर पुनः मेरी वञ्चना करेगी। इसीलिये सखी ! मैं तो तुझे बेच दूँगी--किसी चाहने वाले के अधीन कर दूँगी, जिससे तू लौट न सके। पर तेरा ग्राहक इस व्रज में कहाँ है ? हाय ! हाय !! कदाचित् कोई तेरा ग्राहक मिल जाय तो नींद सखी ! उसके हाथ तुझे बेचकर मैं अपना पिंड छुड़ा लूँगी।' 

            बड़भागिनी व्रजसुन्दरी श्रीकृष्ण दर्शन में बाधा पाकर नींद-जैसी वस्तु को भी बेचने का संकल्प कर रही है, पर हम लोग इतने अभागे हैं कि प्रत्यक्ष में जो वस्तुएँ श्रीकृष्ण दर्शन में निरन्तर बाधक है, जिनका त्याग अत्यन्त आसानी से चाहते ही किया जा सकता है, उन्हें चाह–चाहकर, बुला–बुलाकर हृदय से लगाये रहते हैं, उनके न मिलने पर दुःखी होते रहते हैं।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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