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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

               *१२८*

*अन्य के लिये स्थान न रहे*

             पढ़ने-सुनने का सार इतना ही है कि नेत्रों में, मन में, प्राण में प्रिया-प्रियतम बस जायँ, अन्य के लिये तनिक भी स्थान न रहे।

*प्रीतम छवि नैनन बसी, पर छबि कहाँ समाय।।*
*भरी सराय ‘रहीम' लखि, आपु पथिक फिरि जाय।।*

           सराय (धर्मशाला) में तिल रखने का भी स्थान न देखकर जैसे नया यात्री वहाँ से हटकर दूसरी धर्मशाला की खोज में चला जाता है, वैसे ही नेत्र, मन,प्राण सर्वत्र प्रिया–प्रियतम को भरा देखकर विषय अपने-आप हट जायँ, इसके लिये प्रयत्न करें।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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