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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

           *१२९*

*व्रज की रज में रहकर सारी चिन्ता भूल जाइये*

           आप लिखते हैं--श्रीवृन्दावन निजधाम में रहते हुए भी मेरे मन में न जाने कितने पाप भरे हैं, कुछ भी असर होता नहीं। बात ठीक है ; पर चिन्ता क्यों करते हैं ? राधारानी के घर में रहकर चिन्ता क्यों ? राधारानी की प्यारी भूमि में रह रहे हैं--भला, यह कम सौभाग्य की बात है ? बस, इसी सौभाग्य को याद करते हुए आनन्द में मस्त रहिये। चाहे कुछ न हो, उस परम पवित्रतम सच्चिदानन्दमयी भूमि की रज में रहकर सारी चिन्ता भूल जाइये।

      आप ब्रज में बसते हैं, राधारानी की अपार कृपा से ही व्रजवास मिलता है। पर जैसे शरीर ब्रज में है, वैसे मन का अणु-अणु व्रजकिशोरी एवं व्रजकिशोर में रम जाय, इतनी चेष्टा और करें।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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