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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

             *१३*

*तत्परता से हम चेष्टा करें; फिर कभी तो भगवान की कृपा पूर्ण कर ही देगी*

    भगवत स्मरण की चेष्टा में त्रुटि नहीं होनी चाहिए। यह निश्चित है कि त्रुटि इसलिए होती है कि हम त्रुटि होने देते हैं। कम-से-कम प्रत्येक पाँच मिनट पर भगवत्स्मरण का नियम अत्यन्त दृढ़ता से निभाना चाहिए। इसमें जरा भी कठिनाई नहीं है। केवल मन की लगन होने से ही काम हो जाएगा। मन का स्वभाव तो बहुत बदमाशी करने का है, पर इसमें एक गुण भी बड़ा सुन्दर है। हम जिस चीज में इसे लगा दे तथा एक बार अच्छी तरह उस वस्तु को पकड़ा दे, फिर वह जल्दी उस वस्तु को छोड़ना नहीं चाहेगा। अनादि काल से हमने इसे संसार पकड़ा रखा है, इसी से वह इसे छोड़ना नहीं चाहता। पर एक बार दृढ़ता से यदि हम इसे भगवान का चिंतन पकड़ा देंगे तो फिर यह भगवान को भी दृढ़ता से ही पकड़ लेगा और छोड़ना नहीं चाहेगा। यह सर्वथा सत्य है कि हमारी इच्छा की कमी के कारण पाँच-पाँच मिनट के भगवत स्मरण में भूल हुई है, होती है; नियम छूटता है। यदि हम चाहने लगे कि पाँच-पाँच मिनट पर भगवत्स्मरण में भूल नहीं होने देंगे, तो हम देखेंगे प्रत्येक दिन में भूल में कमी होने लगेगी और कुछ ही दिनों में भूल होनी बंद हो जायगी। हाँ, हम करेंगे ही नहीं तो फिर उसकी दवा ही नहीं है। तत्परता से हम चेष्टा करें फिर कभी तो भगवान की कृपा पूर्ण कर ही देगी।

     कोई कह सकते हैं, मन नहीं लगता, सो मन तो लगाने से ही लगेगा। इसका *एक उपाय है--२४ घंटे का हम नियमित कार्यक्रम बना ले --इतनी देर तक अमुक काम, फिर अमुक काम, फिर अमुक।* इस प्रकार ठीक कार्यक्रम जँचाकर घड़ी से सब काम करें तथा ध्यान रखें कि जो काम जिस समय करेंगे, उसमें मन लगाकर ही करेंगे। केवल भगवान की स्मृति के लिए छूट है; क्योंकि मुख्य वस्तु जीवन में भगवत्स्मरण ही है अन्यथा प्रत्येक काम मनुष्य को पूरे मनोयोग से करना चाहिए। प्रत्येक कार्य हम पूरे मनोयोग से करें। *दो महीना यदि ठीक २४ घंटे का कार्यक्रम जाकर करें तो फिर हमको किसी प्रमाण की जरूरत नहीं होगी, स्वयं ही एक विलक्षण आनन्द मिलेगा।*

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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