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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

              *१३६*

*शरीर के लिये संयम, पथ्य एवं औषध की व्यवस्था रखनी ही चाहिये।*

         शरीर क्षण-क्षण विनाश की ओर ही बढ़ रहा है, यह प्रत्यक्ष है, पर विनष्ट होने से पूर्व इसे यथासम्भव इस अवस्था में अवश्य रखना चाहिये कि यह अपने में रहने वाले मन को प्रिया-प्रियतम की ओर बढ़ते समय कहीं अद्विग्न न कर दे। मन जिस क्षण वास्तव में प्रिया-प्रियतम को पकड़ लेगा, उस समय तो इसकी सँभाल की आवश्यकता नहीं रहेगी ; सँभाल करेगा भी कौन ? सँभाल करता है मन ; किंतु वह तो प्रिया-प्रियतम से जा जुड़ा। अतः उस परिस्थिति में तो शरीर का जो होना होगा, हो ही जायगा। पर उससे पूर्व शरीर के लिये संयम, पथ्य एवं औषध की व्यवस्था रखनी ही चाहिये।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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