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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
 
              *१३७*

*प्रियाप्रियतम के प्रति सच्ची चाह का स्वरूप*

          प्रिया-प्रियतम का अखण्ड चिन्तन करें--बस, यही सार है। अभी मन में अनेकों वासनाएँ, अनेक कर्तव्यबुद्धियाँ भरी है। सब वासनाओं के जल जाने पर ही प्रिया-प्रियतम के प्रेम की नींव खुदेगी, जीवन की धारा उनकी ओर मुड़कर यह सच्ची चाह उत्पन्न होगी--

कबै झुकत मो ओर कौं ऐहैं मद-गज-चाल।।
गरवाही दीन्हें दोऊ, प्रिया नवल नँदलाल।।
सिर झलत मंजुल मुट कटि लौ लट रहि छूटी।
सोहत ललित लिलार पै, उभै भौंह की जूटि।।
ता मधि बेंदी रतन की, गर मुकता की माल।।
नैन छकौंहे कछु अरुन, सुंदर सरस बिसाल।।
कुंडल-झलक कपोल पर, राजति नाना भाँति।।
कब इन नैननि देखिहौं बदन-चंद की कांति।।

           अभी तो, सच पूछें, भजन की नकल भी नहीं पूरी हो रही है। बस, उनकी कृपा की बाट देखते रहिये।

         *           *          *
   
          सिवा युगल-सरकार के और कुछ भी नहीं दीखे--इसका सरल-से-सरल उपाय है कि मन में युगल-सरकार के प्रति आसक्ति पैदा हो जाय। फिर मन में ही नहीं, बाहर की आँख भी जहाँ जायगी, वहाँ युगल-सरकार ही दीख पड़ेंगे। वस्तुतः युगल-सरकार के अतिरिक्त देखने के लायक कोई और वस्तु है भी नहीं ; पर हम लोगों का मलिन मन इस बात को नहीं मानता, यही दुर्भाग्य है।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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