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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

              *१३८*

*वहीं करें, जिसमें श्रीप्रिया-प्रियतम का मार्ग अधिक-से-अधिक प्रशस्त हो* 

          जीवन का अनमोल समय व्यर्थ न जाय। बातों-बातों में ही जीवन समाप्त होता जा रहा है। यदि प्रिया-प्रियतम के चरणों में अनुराग नहीं हुआ तो यहाँ की सारी सफलता व्यर्थ है। दूसरे बातों से अनुराग होता भी नहीं ; उसके लिये सर्वस्व त्याग करना पड़ता है। जब तक कुछ भी बचाकर रख लेने की वासना है, तब तक प्रेम की बात करना तमाशा-सा है। अतः कहना यह है कि मन-ही-मन जरा यहाँ के मोह को छोड़ने का अभ्यास कीजिये। माना, आपमें त्याग है, पर साथ ही सात्त्विक चेष्टा के नाम पर बहुत-सी ऐसी चेष्टाएँ भी आप करते रहते हैं, जिनमें आपकी शक्ति व्यर्थ खर्च होती है। अतः एकमात्र वही आपको करना चाहिये, जिससे श्रीप्रिया–प्रियतम के प्रेम का मार्ग अधिक-से-अधिक प्रशस्त हो। थोड़ी सावधानी रखें, जिससे आपके द्वारा जो व्यर्थ चेष्टाएँ होती हैं, उनमें रोक लगे।।

          सारी बात इस बात पर निर्भर करती है कि श्रीप्रिया-प्रियतम की स्मृति कितनी होती है। यदि स्मृति बढ़ रही है तो मार्ग ठीक है, किंतु यदि इसमें कमी आ रही है तो आप पथ भूल गये हैं, यह निश्चित बात है। आप इस कसौटी पर कसकर ही जीवन का सावधानी से सुधार करना चाहिये।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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