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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

             *१३९*

*दूसरे की ओर न देखकर आप अपने को ही सुधारिये*

         आप वृन्दावन में रह रहे हैं--यह बड़ा सौभाग्य है ; पर वृन्दावन में रहकर आप दूसरों की त्रुटिरुप गंदी बातों को देखने के लिये समय क्यों लगाते हैं ? मेरी तो प्रेम भरी राय है कि जहाँ कहीं भी--जिस स्थान में,  जिस मन्दिर में बुरी बातों को देखने-सुनने का मौका मिले, वहाँ जाना आप स्थगित कर दें। सर्वत्र आपको यदि यही मिलता हो तो आप जिस मकान में हैं, उसी को प्रिया-प्रियतम का मन्दिर मानकर उसके कण-कण में उनकी भावना कीजिये। वे वहाँ हैं ही ; आपको इसलिए नहीं दीखते की आप अभी उन्हें देखना नहीं चाहते। किन्तु यदि आपका मकान कहीं त्रुटियुक्त वातावरण से भरा हो तो मैं तो यही कहूँगा कि आप वृन्दावन छोड़कर कहीं दूसरी जगह चले जाइये। बस, दूसरे की ओर न देखकर आप अपने को सुधारिये।

           व्रज में रहते हुए जीवन श्रीप्रिया-प्रियतम के चरणों में न्यौछावर होना चाहिये। इसी के लिए अधिक-से-अधिक चेष्टा होनी चाहिये। प्रपञ्च की बात कम-से-कम सुनें एवं कहें। अपना अधिकांश समय भजन, पाठ, श्रीविग्रह-दर्शन, श्रीरास-दर्शन, लीला-श्रवण एवं प्रिया-प्रियतम के नाम-कीर्तन आदि में बिताना चाहिये।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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