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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

               *१४*

*सच्चे संत का स्पर्श करें फिर हम उसी ढाँचे में ढल जायँगे*

   विश्वास करें--हम चाहे मलिन- से- मलिन प्राणी क्यों ना हो, केवल मैले की तरह हममें दुर्गंध ही क्यों ना भरी हो, बाहर-भीतर,ऊपर-नीचे, केवल बदबू आ रही हो, पर सन्त नाम की वस्तु इतनी पवित्र है, इतनी सरस है कि उसका स्पर्श होते ही हम बिल्कुल उसी ढाँचे में ढल जायँगे। आज क्या यह देखती है कि यह मैला है? मैला आग में पड़े कि सारे-का-सारा अंगारा बन जाएगा। हम मिलें, उसमें मिलें, अपनी सारी मलिनता, सारी दुर्गंध, लेकर मिलें। दिन-रात उसके इशारे पर चलने की चेष्टा करें, दिन-रात सोचें-- *'संत कितने कृपालु हैं'*। दिन रात यह विचार करें--कृपामय तुम्हारी कृपा ही मुझे भले अपना ले, मुझ में तो बल नहीं है। *दिन-रात नाम ले। चलते फिरते नाम ले, इसे बड़ी सहायता मिलेगी।* दिन-रात यही इच्छा करें कि संत का संग नहीं छूटे दिन-रात यही सोचे कि संत के लिए परिवार, संत के लिए इज्जत, यदि बाधक है तो संत के चरणों में इनको भी समर्पण कर देना है। इसका यह अर्थ नहीं है कि संन्यासी बन जाना है। बाहर कपड़ा रँगकर भी क्या होगा? परन्तु यह नितान्त सत्य है कि सर्वस्व की आहुति देने के लिए तैयारी मन से ही करनी पड़ेगी। बाहर का ढाँचा ज्यों-का-त्यों रहकर मन बिल्कुल खाली हो जायगा, तभी हमारी अभिलाषा पूर्ण होगी। *यदि किसी संत की दृष्टि, अमृतमयी दृष्टि, अमोघ दृष्टि पड़ चुकी है तो हमारे लिए परवाना काटा जा चुका, परंतु हम यदि अपनी ओर से देने के लिए जिसकी चीज है उसकी ही चीज उसको लौटाने के लिए तैयार हो जाए, अर्थात अपनी ममता उठाकर सब पर उसका अधिकार माने तो फिर शीघ्र-से-शीघ्र कृपा प्रकाशित हो जाएगी।*

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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