140
*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
*१४०*
*श्रीकृष्ण सच्ची चाह के मोल में अपने-आपको बेच देते हैं ।*
भगवच्चरणों में पूर्णरूप से समर्पित हो जाने में ही जीवन की सार्थकता है। इसके लिये सब जगह से सभी आसक्तियों को खींचकर एकमात्र श्रीभगवान में ही पूर्ण ममत्व स्थापित करें। थोड़ा विचार करके देखें तो पता चलेगा। इस समय भी हम लोग वास्तव में आंशिक रूप से भगवान के साथ जड़े हैं। सोचिये--संसार में जो कोई भी मनुष्य आपको प्यारा लगता है, वह क्यों प्यारा लगता है ? यदि शरीर प्यारा होता तो जब इस शरीर से चेतन निकल जाता है, तब भी वह प्यारा लगना चाहिये था। पर ऐसा होता नहीं। जहाँ चेतन इस शरीर से निकला कि लोग इसे 'मुर्दा' नाम दे देते हैं, अपने प्यारे से प्यारे का शरीर भी ‘मुर्दा' हो जाता है, इसे हम लोग जला डालते हैं, नष्ट कर देते हैं, यहाँ तक कि कई तो उस शरीर से डरने लग जाते हैं। आपका शरीर भी आपको तभी तक प्यारा है, जब तक आप उस शरीर में चेतनरूप से हैं ; आप जहाँ इससे निकले कि फिर इसे बिल्कुल भूल जाइयेगा। यह चेतन, जिसके रहने से स्त्री-पुत्र, भाई-बन्धु-मित्र आदि का शरीर प्यारा लगता है, श्रीकृष्णका ही अंश है। अतः यह सिद्ध हुआ कि असल में हम श्रीकृष्ण के अंशसे ही प्रेम करते हैं, क्योंकि अंश के न रहने पर फिर हमारा उस शरीर से प्रेम हट जाता है। भले ही पीछे रोये, पर स्त्री भी अपने मृत पति के पास नहीं रहना चाहेगी। उससे कहिये--'अरे! तुम्हारे पति हैं, इनके पास बैठो।' वह उत्तर देगी--'वे तो अब इस शरीर से चले गये।' सारांश यह है--सभी आसक्तियाँ तभी तक है, जब तक श्रीकृष्ण का अंश वहाँ मौजद है। श्रीकृष्ण का अंश छिपा कि आसक्ति भी छिपी।
अब फिर सोचिये, जिसका एक अंश आपको इतना मोहित कर रहा है, वे स्वयं पूर्ण रूप में यदि आपके सामने आयें तो कितने मोहने वाले होंगे ! वे आ सकते हैं और आपके साथ सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं। केवल चाहने की ही देर है। श्रीकृष्ण का मूल्य सच्ची चाह है। वे तो अनमोल हैं, पर सच्ची चाह के मोल में अनमोल होकर भी अपने आपको बेच देते हैं। ऐसा बढ़िया सुन्दर सौदा है--अलभ्य, अनुपम, सर्वोत्कृष्ट सौदा है ; पर हम लोग ऐसे अभागे हैं कि दिन-रात संसार के ही पदार्थों में--उनके (भगवान के) क्षुद्र आंशिक प्रकाश में ही रम रहे हैं और उन्हें (भगवान को) नहीं चाहते। यह चाह हो कैसे ? महात्मा लोग, अनुभवी लोग कहते हैं कि यह चाह मलिन अन्तःकरण में होनी असम्भव है। जैसे भी हो, अन्तःकरण को साफ करो ; फिर सच्ची इच्छा जागेगी। अन्तःकरण को साफ करने का इस युग में एकमात्र सबसे सरल उपाय है--निरन्तर नाम-जप। यदि कोई चाहे, सचमुच चाहे तो--भाईजी श्रीहनुमानप्रसाद पोद्दार का कहना है --‘भगवान् और प्रार्थना सुनने में भले ही देर करें, पर भजन हो--यह प्रार्थना अवश्य–अवश्य सुन लेते हैं।' अब विचार कीजिये कि हम लोगों को क्या करना चाहिये।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
Comments
Post a Comment