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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

              *१४१*
 
*हृदय में निरन्तर उनके लिये आसन तैयार कीजिये*

          प्रिया-प्रियतम में मन लगने में दृढ़ निश्चय की कमी है। दृढ़ निश्चय करके हृदय का द्वार उनके लिये खोलकर प्रतीक्षा कीजिये, फिर तो वे स्वयं प्रवेश कर जायेंगे। वे आपके हृदय के द्वार पर न जाने कितनी बार आते हैं, पर द्वार बंद पाते हैं, अथवा खुला भी होता है तो वे देखते हैं कि उनके लिये तो वहाँ स्थान ही नहीं है। आदि से अन्त तक, ऊपर-नीचे, बाहर-भीतर सर्वत्र संसार भरा है। फिर वे कैसे प्रवेश करें ? प्रवेश करें भी तो कहाँ ठहरें ? इसलिये आवश्यकता है कि द्वार खोल दें, अर्थात् सच्ची इच्छा मन में जाग्रत करें कि मुझे एकमात्र प्रिया-प्रियतम की आवश्यकता है, उनके अतिरिक्त मुझे और कुछ भी नहीं चाहिये तथा उनके लिये हृदय में स्थान बनाइये। हृदय में निरन्तर उनका ही चिन्तन बना रहे, निरन्तर उनके लिये आसन तैयार होता रहे। भूल जाइये इस संसार को उसके स्थान पर स्मरण कीजिये--‘कल-कल करती हुई कालिन्दी प्रवाहित हो रही हैं ; तट पर परम मनोहर दिव्यातिदिव्य एक कुसुमित कदम्ब है। कदम्ब के नीचे परम सुन्दर मणिमय वेदी है। उस वेदी पर कदम्ब की एक परम सुन्दर टहनी अपने कर-कमल में धारण किये श्रीयुगल -सरकार अवस्थित हैं। उनके श्रीअंगों के सौंदर्य से कदम्ब, कालिन्दी, वन-उपवन-सभी उद्भासित हो रहे हैं। उनके अंग सुवास से सारी वनस्थली सुवासित हो रही है, ऐसी झाँकी से मन को निरन्तर भरते रहिये। फिर वे वन विहार करते हुए आपके हृदय मन्दिर के द्वार पर पधारेंगे। उन्हें द्वार उन्मुक्त मिलेगा, वे झाँक कर देखेंगे, सर्वत्र उन्हें अपनी ही छाया नाचती हुई दिखेगी तथा कौतूहलवश वे एक बार उस छाया को छू लेंगे। फिर तो छाया उन्हीं का स्वरूप बन जायगी। आपके चिन्तन की झाँकी वास्तविक दर्शन की झाँकी बन जायगी। आप सदा के लिए कृतार्थ हो जायँगे। पर यह बातों से नहीं होता, करने से होता है।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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