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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

             *१४५*

*केवल इतना ही करना है*

        आप वृन्दावन में जाकर भी वृन्दावन-विहारी को नहीं देख पा रहे हैं, यह सचमुच विचारणीय है। आपको वृन्दावनविहारी न दिखकर अधिक समय दिखता है संसार। यही कारण है कि जैसा आपका जीवन होना चाहिये, वैसा नहीं हो पा रहा है तथा जब तक आप पूरी दृढ़ता से अपने जीवन की धारा प्रियाप्रियतम की ओर मोड़ना नहीं चाहेंगे, तब तक कोई दूसरा ऐसा कर दे, यह सम्भव ही नहीं। यह आपको ही करना पड़ेगा। आज करें, मरते समय तक करें, कभी भी करें, करना आपको ही है। अतः अभी से सावधान होकर यह कार्य कर लें तो अनर्थक दुख, चिन्ता, फिक्र से बच जायँ। काम भी कठिन नहीं है। केवल इतना ही करना है--

           १- कान से प्रिया-प्रियतम की चर्चा के सिवा दूसरा शब्द जहाँ तक सम्भव हो, बिल्कुल नहीं सुनें।
         
           २- आँख से प्रिया-प्रियतम के सम्बम्ध की चीजों के सिवा दूसरी वस्तु यथा सम्भव न देखें। 

            ३- वाणी से 'राधाकृष्ण- राधाकृष्ण' की पुकार एक क्षण भी न छोड़ें। बस, फिर जीवन की धारा वृन्दावनविहारी की ओर बह चलेगी। उस धारा में स्नान करते प्रिया-प्रियतम किसी दिन प्रकट हो जायँगे और आप निहाल हो जायँगे।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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