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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
*१४७*
*बहुत समय बीत गया*
बहुत समय बीत गया। अब वास्तव में श्रीप्रिया-प्रियतम की प्रीति प्राप्त हो, यह चेष्टा करनी चाहिये--
कहत-सुनत बहुतै दिन बीते, भक्ति न मन में आई।
स्याम-कृपा बिनु, साधु संग बिनु, कहि कौनें रति पाई।।
अपने-अपने मत-मद भूले, करत आपनी भाई।
कह्यौ हमारौ बहुत करत हैं, बहुतनि में प्रभुताई।।
मैं समुझी, सब काहु न समझी, मैं सब इन समुझाई।
भोरे भक्त हुते सब तब के, हम तौ बहु चतुराई।।
हमही अति परिपक्व भए, औरनि कैं सबै कचाई।।
कहनि सुहेली, रहनि दुहेली, बातनि बहुत बड़ाई।।
हरि मंदिर, माला धरि, गुरु करि जीवनि के दुखदाई।।
दया, दीनता, दास-भाव बिनु, मिलै न ‘ब्यास' कन्हाई।।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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