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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

               *१५*

*विवेक का आश्रय कर अपनी चेष्ठाओं का नियन्त्रण करें*

 कभी शान्त चित्त से हमने विचार किया होगा तो हमें पता लगा होगा कि हमारा मन सुख की प्राप्ति के लिए प्रतिक्षण लालायित है। जीवन के कण कण में सुख की वासना धँसी हुई है। जान में अनजान में, हमारी जो कुछ भी चेष्टा होती है वह होती है केवल सुख प्राप्ति के लिए। यदि हमें स्वप्न में भी भान होने लगे कि हमारी अमुक चेष्टा से दुख का कोई आसार नजर आ रहा है, तो तत्क्षण हम उस चेष्टा से विरत हो जायँगे यह मानव मात्र के लिए ही नहीं पशु पक्षियों तक के लिए लागू होता है। *मानव में और पशु- पक्षियों में इतना ही अंतर है कि मानव को विवेक प्राप्त है और पशु पक्षी भोग योनि होने के कारण अपनी संपूर्ण चेष्ठाओं में सर्वथा परतन्त्र हैं*;परन्तु उन चेष्ठाओं के मूल में हेतु सुख की प्राप्ति ही है, भले ही परिणाम में दुख की उपलब्धि हो। मनुष्य ही एक ऐसी सृष्टि है जिसमें प्रभु के परम मंगलमय विधान के अनुसार उसे *'विवेक'* नाम की वस्तु प्राप्त है और उस विवेक का आश्रय करके वह अपनी चेष्टाओं का नियन्त्रयण कर सकता है।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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