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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

          *१५४*

*मन को एकमात्र प्रिया-प्रियतम की ओर केन्द्रित करें*

            सत्संग से पूरा-पूरा लाभ उठाना चाहिये। पूरा लाभ यही है कि मन भगवान में पूर्णतया लग जाय ; सब ओर से प्रीति हटकर एकमात्र प्रिया-प्रियतम की ओर केन्द्रित हो जाय--

नरक-स्वर्ग-अपवर्ग-आस नहिं त्रास है।
जहँ राखौ तहँ रहौं मानि सुखरास है।।
देव ! दया करि दान 'न भूलौं केलि' को।
भगवत बलित तमाल बिलोकौं बेलि को।।
दुख-सुख भुगते देह, नहीं कछु संक है।
निंदा-अस्तुति करौ राव क्या रंक है।।
परमारथ ब्यौहार बनौ कै ना बनौ।
अंजन है मम नैन रसिक भगवत सनौ।।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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