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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

             *१५८*

*यही सार है--यही करना है*

           जीवन का प्रत्येक क्षण प्रिया-प्रियतम के चिन्तन में बीते, इसके लिए खूब सचेष्ट रहें। इस अनमोल जीवन के समाप्त होने से पूर्व ही श्रीप्रिया-प्रियतम को मन में बसा लिया, तब तो सब कुछ कर लिया ; नहीं तो सब कुछ करके भी जीवन व्यर्थ ही समाप्त हो गया--यह सर्वथा सच्ची बात है।
            भगवान की स्मृति निरन्तर बनी रहे, इसी में जीवन की सफलता है, इसी की चेष्ठा करनी है।

            अनमोल जीवन को दूसरों की पापमयी बातों को देखने-सुनने में मत खोइये। दूसरे के दोषों की ओर से दृष्टि मोड़कर प्रियाप्रियतम में मन लगाइये--यही सार है।

            प्रिया-प्रियतम के रूप-सागर में मन को डूबा दें, मन को उस सौंदर्य-समुद्र में सर्वथा मिलकर एकमेव हो जाने दें। फिर यह संसार नहीं दीखेगा, वे ही दिखेंगे। आपकी जलन सदा के लिए शान्त हो जायगी। यही करना है, यही करना चाहिये।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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