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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*मेरी इतनी ही सलाह है*
मेरी इतनी ही सलाह है कि सत्संग में जो कुछ भी सुनें, उसको प्रिया-प्रियतम के अखण्ड स्मरण में सहायक बना लें। बस इससे अधिक मैं क्या लिखूँ--
तनहिं राखु सत्संग में, मनहि प्रेमरस भेव।
सुख चाहत हरीबन्सहित, कृष्ण कल्पतरु सेव।।
निकसि कुंज ठाढ़े भए, भुजा परस्पर अंस।
राधाबल्लभ-मुख-कमल, निरखत हित हरिबंस ।।
सबसे हित निकाम मन, बृन्दाबन बिश्राम।
राधाबल्लभ लाल कौ, हृदय ध्यान, मुख नाम।।
रसना कटौ जु अनरटौ, निरखि अन फुटौ नैन।
सवन फुटो जो अनसुनौ, बिनु राधा जसु बैन।।
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और सबसे अन्तिम बात यह है कि निरन्तर नाम लीजिये ; और कुछ भी नहीं करना है, सब भगवान् करेंगे।
संतों से सुना है--‘दूसरा क्या करता है, इस ओर मत देखो ; तुमसे कितने पाप होते हैं, यह देखो।' निष्पाप होने का यह सरल साधन है। यदि तुम्हारे मन में जलन नहीं है, तुम्हारा मन साफ, शान्त है तो समझो कि पाप कम बन रहे हैं, पर यदि जलन अधिक है तो पाप अधिक बन रहे हैं। तुम्हारा पाप ही तुम्हें जलाता है, भले ही निमित्त कुछ भी, कोई भी क्यों न हो । यदि तुम भगवान को याद करोगे ; अपने पापों के लिये पश्चात्ताप करोगे तो संचित पाप की ढेरी जलने लगेगी और तुम्हारे मन की जलन कम होने लगेगी।
भगवान की शरण हो जाओ। उनका नाम लो। उनके सामने अपने सब पापों को खोलकर रख दो। फिर वे कहेंगे कि ‘चिन्ता तुम मत करो।'
कहीं पर भी रहकर भजन तो हो ही सकता है। उत्कट चाह होने से ही भजन होगा। यह ठीक है कि संग भजन में बड़ा सहायक होता है ; पर वह तो अपने हाथ की बात नहीं। कड़ा नियम लेने से कुछ-न-कुछ भजन बनेगा ही ; अतः कुछ मालाओं का नियम अवश्य लें।
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आप प्रभु से प्रार्थना करते हैं--‘हे नाथ ! अशुद्ध वातावरण से निकलकर चिन्तनमय वातावरण में रखो ; परंतु विशुद्ध एवं सच्ची प्रार्थना न होने के कारण
प्रभु की ओर से जवाब नहीं मिलता।' आपका यह मानना ठीक है, पर जिस-किसी भी प्रकार से प्रभु से जुड़े रहने का मंगलमय फल आगे चलकर अवश्य प्राप्त होता है। अतः इस प्रकारक बहाने से भी प्रतिदिन प्रभु से कुछ समय यदि जुड़े रहेंगे तो बड़ा लाभ होगा। उनकी कृपा झूठी प्रार्थना को भी निमित्त मानकर प्रार्थना करने वाले को ऊपर खींच लेती है। अतः प्रार्थना करते चले जायें। बस ,भगवान की कृपा पर विश्वास कीजिये और उन्हें रो-रोकर पुकारिये, किसी-न-किसी दिन वे सुनेंगे ही।
*परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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