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*आस्तिकता की  आधार-शिलाएँ*

              *१६*

*पूरी सच्चाई के साथ हम भगवान की ओर चल पड़ें, फिर अपनी अहैतुकी कृपा का प्रकाश वे स्वयं कर देंगे*

          सत्य का प्रकाश सत्य यह है कि यहाँ भगवान के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है; जब आँखें खुल जाती है, तो केवल, केवल, केवल 'एक' ही बचा रह जाता है। वह 'एक' कैसा है, क्या है, कितना बड़ा है--यह भी वही अनुभव करता है जिसकी आँखें खुली हुई है अथवा जो स्वयं भगवान है, केवल वे ही जानते हैं वे क्या है, कैसे हैं।

         उस एक नित्य सत्य स्थिति में प्रतिष्ठित होने से पहले हमारी जो मान्यता, जो निश्चय उस सत्य के सम्बन्ध में है उसे लेकर ही हम चल पड़े, पूरी सच्चाई के साथ चल पड़े। बिना पेंदी के लोटे की तरह यदि कभी पूर्व, कभी पश्चिम, कभी दक्षिण ,कभी उत्तर की ओर मुड़ते रहेंगे, लुढ़कते रहेंगे, तो समझ लें, हमारे अंदर पूरी सच्चाई नहीं है; हम भगवान की ओर पूरी सच्चाई के साथ चलना नहीं चाह रहे है। यह सच है कि कभी-कभी बड़ी भीषण तूफान में पेंदी लगा हुआ लौटा भी दस हाथों खिसक जाता है, वैसे ही माया के भीषण चपेट में ऊँचे-से-ऊँचे साधक क्षण भर के लिए डगमग से हो जाते हैं। किन्तु उनका डगमग-सा होना भी उनके सत्य में नित्य सत्य भगवान में पूर्ण प्रतिष्ठित होने के लिए होता है। जैसे खूँटे को जमीन में गाड़ने वाला उसे बार-बार हिला कर देखता है कि वह हिल तो नहीं रहा है-- *वैसे ही भगवान स्वयं ही उसको--किसी ऊँचे साधक को हिला कर उससे खेलते हैं।* देखते हैं कि वह हिलता है या नहीं? तथा फिर से जैसे खूँटे को हिलते देख खूँटा गाड़ने वाला और भी विवेक से उस पर चोट मारता है, उसे अडिग, अचल गाड़कर ही छोड़ता है, वैसे ही भगवान उस ऊँचे साधक को माया के हाथ से हिलाकर, उसे हिलते देख कर उस पर अपनी अपनी अपरिसीम कृपा का तत्क्षण प्रकाश कर देते हैं; उसे अपने में मिलाकर, अचल पूर्ण प्रतिष्ठित करके ही छोड़ते हैं।

         किन्तु यदि हम अपनी ठीक ठीक जाँच करें तो हमें यही दिखेगा कि ऊँचा साधक क्या, हम तो परमार्थ-साधक ही नहीं हैं। हम तो अभी तक विषय साधक बने हुए हैं जैसे बिना पेंदी का लोटा हो और बार-बार उसी दिशा में लुढ़क रहे हैं, जिधर हमें विषयरूपी मैला अपने अंदर भरने के लिए प्राप्त हो जाये। हम तो उससे भी गये-बीते हैं, जो एक छोटा शिशु है, खेल में गिर पड़ने के कारण मैले में सन गया है और अपनी माँ को पुकार रहा है--'अरी मैया! तू दौड़कर आ जा री; मैं गिर पड़ा हूँ, मुझे मैले में से निकाल री'। हम तो उसी गड्ढे में उसी मैले में ही और भी सन जाने का सुख अनुभव कर रहे हैं और सोच रहे हैं--'माँ नहीं देख रही है, बड़ा अच्छा है।' परमार्थ का साधक ऐसा नहीं होता। ऐसा साधक तो स्पष्ट ही विषय का साधक है और इसलिए हमारी यह दुर्दशा है।

           फिर भी घबराने की आवश्यकता नहीं है। *यहाँ की माँ भी देर हो जाने पर बच्चे को ढूँढने बाहर निकल पड़ती है, फिर अनन्त भूत, भविष्य, वर्तमान की असंख्य माताओं का एकत्रित प्यार जिन भगवान के अपरिसीम प्यार के महासमुद्र की एक बूँद में ही समा जाता है वह भगवान तो हमारे पास ही अवस्थित रहकर हमें देख रहे हैं।* ऐसे वे भगवान क्या हमारे सामने प्रकट नहीं होंगे? अवश्य होंगे और हमारा सब भल धोकर हमें अपने अंक में ले लेंगे, हमें अपने में मिला लेंगे।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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