18
*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
*१८*
*हमारे किसी आचरण से विश्वरूप प्रभु को कोई बुरी चीज मिले ही नहीं*
अन्तिम साँस तक शरीर में, इन्द्रियों में अभिव्यक्ति उसी की होती रहे कि जिस पथ से जाने के लिए भगवान व्रजेन्द्रनन्दन-स्वरूप ऋषि-मुनि निर्देश कर गए हैं। सीधी भाषा में हम ऐसे शब्द ऐसे समझे कि महासिद्ध होने से पहले तक आचरण में ऊंचे से ऊंचे साधक के द्वारा भी वैसा ही आचरण-व्यवहार होना चाहिए कि जिस आचरण से विश्वरूप प्रभु को कोई बुरी चीज मिले ही नहीं। उसके आचरण ऐसे ही हो कि जिस का अनुकरण करके कोई बहक ही ना सके उस की ओट में *आत्मवञ्चना* कर ही ना सके।
कोई कहे--'मैं तो भगवान की शरण में निरंतर पड़ा रहता हूँ।' तो यह वाणी की शरणागति भी बड़ी अच्छी चीज है किन्तु *असली शरणागति* होते ही क्या होता है? बड़ी तेजी से उसके अंदर, शरणागत के अन्दर कुप्रवृत्ति का नाश होने लगता है, उसे बुरी प्रवृत्ति की ओर से घृणा होने लगती है और क्षण-क्षण में एक पवित्र पागलपन की वृद्धि आरम्भ हो जाती है, चलती रहती है--'यह देखो, यह देखो, भगवान की कृपा आ रही है, अरे, देखो, देखो भगवान की कृपा मेरे ऊपर बरस बरस रही है.......' ऐसी शरणागति की धारा में यदि हम बह रहे हों,स्नान कर रहे हो, तब तो कोई बात नहीं, कोई भय नहीं अन्यथा उपर्युक्त बात पर अवश्य ध्यान देना चाहिए।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
Comments
Post a Comment