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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*जो भी परिस्थिति उत्पन्न हो उसमें हम श्री कृष्ण को लाकर बिठा दें*
जो भी परिस्थिति उत्पन्न हो, उसमें हम श्री कृष्ण को ला कर बैठा दें और उन पर ही उस परिस्थिति का भार सौंप दें। तो परिणाम यह होगा कि उस परिस्थिति में यथोचित प्रकाश *अवश्य-अवश्य-अवश्य* मिल ही जायगा। अर्थात श्रीकृष्ण की अनन्त अपरिसीम कृपा हमें अपनी और खींच रही है, इसका अनुभव भी हो जाएगा और साथ ही उस परिस्थिति का भी एक सुन्दर समाधान अवश्य प्राप्त हो जायगा। नहीं होता है, तो उसका विनम्र उत्तर यही है कि हम श्रीकृष्ण को बीच में नहीं ले ही नहीं आते हैं।
कोई भी विषम परिस्थिति हमारे सामने उपस्थित हुई हो, यदि सचमुच-सचमुच हम श्रीकृष्ण को बीच में ला रहे हों, तो उसका परिणाम यह निश्चित होगा कि उस परिस्थिति की तो हमें विस्मृति हो ही जाएगी, साथ ही मन, बुद्धि, चित्त में मात्र श्रीकृष्ण का ही अस्तित्व छा जाएगा और थोड़ी देर बाद हो सकता है एक दिन बाद, दो दिन बाद हमारा जब उसकी ओर से मन हटेगा तो हमें भान यह होगा कि उस परिस्थिति का समाधान बड़े सुन्दर ढंग से हो गया है और तत्क्षण भी यह भी भान हो जाएगा कि सचमुच-सचमुच श्रीकृष्ण हमें अपनी और खींच रहे हैं।
किन्तु होता है सर्वथा इसके विपरीत। हम तो दिन-रात परिस्थिति के चिन्तन में तज्जनित व्याकुलता में अपना समय बिता देते हैं कि 'अरे, अब तक नहीं हुआ। कैसे क्या होगा ?' मानो भगवान को ज्ञान ही नहीं है कि कब, क्या, कैसे करना चाहिए? यहाँ तो सरल विश्वास के साथ जब एकबार कह दिया तो दूसरी बार कहने की आवश्यकता ही नहीं है। हमारा मन केंद्रित हो जाना चाहिए केवल उनकी ओर। जिसको भार सौंप दिया, वह जाने। हम क्यों चिंता करें? बिगड़े या बने, हमें क्या मतलब? यह नितान्त सत्य है आज तक जो अपना भार श्रीकृष्ण पर छोड़ गया है, छोड़ चुका है, उसको उस दरबार से *कभी निराशा नहीं मिली है, नहीं मिली है, नहीं मिली है ,नहीं मिलेगी, नहीं मिलेगी ,नहीं मिलेगी।* निराशा तो उसे ही मिलती है, मिलती है और मिलेगी, मिलेगी, जो भगवान पर ना छोड़ कर उस परिस्थिति पर अपना मन केंद्रित किए हुए हैं और झूठ-मूठ कह रहा है कि 'मैंने अपना सब भार भगवान पर छोड़ रखा है।'
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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