2 भय मन की कल्पना
*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
*२*
*भय मन की कल्पना है*
हम सोचकर देखें--हमें भय क्यों होना चाहिये? जब सब जगह अनन्त शक्तिसम्पन्न, सब कुछ जानने वाले, हमारे प्रति अनन्त सौहार्दमय प्रभु ही नित्य निरन्तर अवस्थित हैं, तो किसी प्राणी-पदार्थ से हम भय करें? खूब गहराई से सोचें, भय एक झूठमूठ अनादिकाल से कल्पित मन की कल्पना है। हमें मामूली-से-मामूली बात में भय होने लगता है; न जाने कितने प्रकार के भय हमें घेरे हुए हैं। क्यों नहीं हम प्रत्येक प्रतिकूल लगने वाली परिस्थिति में अपनी आँख प्रभु की ओर कर लेते और निरन्तर पास में रहने वाले, सर्वशक्तिमय, सब कुछ जानने वाले, अनन्त, अपरिसीम सौहार्दमय प्रभु पर ही सब प्रकार के भय को पूजा के रूप में सदा के लिए समर्पित कर देते? हम सब स्थितियों में सोचने लग जाँय-- *'जैसी प्रभु की इच्छा हो, हो जाएगा। इसमे डरने की क्या बात है ?'* सच मानें, भय की सम्पूर्ण स्थितियाँ बदलने लगेंगी और हमारा मन सच्चिन्मय आनन्द से भरने लगेगा।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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