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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*विभिन्न परिस्थितियों को उत्पन्न कर भगवान हमें इस लायक बना रहे हैं कि हम धूल बन जायें*
जीवन के विभिन्न स्तरों पर ना जाने हमने ना जाने कितने- कितने अनुभव किए होंगे--किसी बार सुख, किसी बात दुख, उनका परिणाम हुआ होगा। पर वे स्थाई नहीं बन सके। जो दुखद परिणाम हुए, वे विस्मृति के गर्भ में चले गए और जो सुखद परिणाम हुए, वे दो-चार नए अभावों की सृष्टि कर नए दुख के बीज बो गए और हम ज्यों-के-त्यों सुख-दुख के झूले में आज तक झूलते रह गए। *हमको इस झूले पर से उतरना पड़ेगा।*
भगवान की अनन्त अपरिसीम कृपा का समुद्र लहरा कर अनेक बार हमें स्नान करा चुका और मानो कृपा ने मुहर लगा दी कि अब हमें उससे मिल ही जाना पड़ेगा। हम कितनी ही उछल-कूद मचाए, वह कृपा का सागर लहरा-लहराकर हमसे खेलता रहेगा और धीरे-धीरे तीन तरफ से बाड़ लगाता जाएगा। मानो कृपा कहेगी कि पूर्व की ओर बढ़े तो इतनी दूर बढ़ सकते हो, इतनी दूर भाग सकते हो, पश्चिम की ओर इतनी दूर भाग सकते हो और दक्षिण की ओर बचकर इतनी दूर भाग सकते हो और उत्तर की और अनन्त सागर के रूप में लहरा ही रही हूँ, जिधर तुम भागना चाह रहे हो। इस प्रकार धीरे-धीरे तीन तरफ के द्वार हमारे लिए बंद कर देगी और हम नाचते-गाते, रोते-हँसते इधर से उधर उस घेरे में दौड़ते रहेंगे और सहसा यह होगा कि एक बड़ी उत्ताल तरंग उस कृपा सागर से उठेगी जो संपूर्ण घेरे को ऊपर तक भर देगी। उसी के प्रवाह में बहते हुए हम अनन्त अपरिसीम सागर में सदा के लिए विलीन हो जायँगे अर्थात भगवान से हमारा आत्यन्तिक तादात्म्य होकर, हमारी अहंता का सर्वथा विलय होकर आत्यन्तिक सच्चिदानन्दमय सुख से हम एकात्माकता लाभ कर लेंगे। इसी के लिए भगवान हमसे निरन्तर खेल रहे हैं। *विभिन्न परिस्थितियों को उत्पन्न कर वे हमें इस लायक बना रहे हैं कि हम धूल बन जाए, पत्थर जैसी अहंता अत्यन्त मृदुल रेणुका बन जाय*, जिससे सागर में मिलते ही वह सर्वथा सर्वांश में सागर का स्वरूप ही बन जाए।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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