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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

               *२१*

*जो साधना हम करते हैं उसे हम आदर पूर्वक मन में बुद्धि में उतारने की चेष्टा करें और भगवान की ओर देखें*

        मनुष्य के मन में विचारों की एक लहर चलती रहती है--एक के पीछे एक, बिल्कुल जुड़ी हुई जो ऊँचे साधक होते हैं, उनका मन शान्त रहता है--स्फुरणा से रहित; किन्तु साधारण मनुष्यों का तो मन किसी-ना-किसी उपापोह में लगा ही रहता है। जगने से सोने तक वे विचारों के भँवर में पड़े रह कर नाचते रहते हैं। उन्हें शान्ति की नींद भी नहीं आती। वैसे ही विचारों से प्रभावित स्वप्न के जाल में छटपट करते हुए उनकी रात कट जाती है। बड़ी दयनीय दशा होती है उनकी।

   प्रारब्धवश जब सफलता के दिन रहते हैं तो उस समय अहंकार बड़ा सुन्दर रूप धारण कर पनपने लगता है, नई-नई सफलता प्राप्त करने की नई-नई योजना बनने लगती है और जब प्रारब्ध दुख-विपत्ति का सृजन करने लगता है, तब वह बढ़ा हुआ अहंकार अथवा पहले के साँचे का ही अहंकार हायतौबा मचाने लगता है, *ठेस-पर-ठेस लग कर ऐसा व्याकुल हो जाता है कि पूछो मत।*

   बीच में कुछ परमार्थ-साधक ऐसे होते हैं, जो तोते की तरह साधना का पाठ रटते हैं। बड़ा अच्छा है कि तोते की तरह भी भगवान की ओर बढ़ने का पाठ रटना ; किंतु होना चाहिए कि यह कि जीवन में श्वास समाप्त होने से पहले बहुत पहले ही हम सत्य का साक्षात्कार कर लें। उसके लिए बहुत परिश्रम की आवश्यकता भी नहीं है। फिर भी तोते की तरह रटने से काम नहीं चलेगा। *जो साधना हम करते हैं उसे हम मन में, बुद्धि में, उतारने की चेष्टा करें आदर पूर्वक।* यदि अपनी साधना में हमारी आदर बुद्धि होगी तो वह अपने-आप चलते-फिरते, खाते-पीते सब समय ही प्रधान बनने लग जायगी, मन ही मन उस प्रकार के विचारों की लहरों का प्रवाह प्रबल होने लग जायगा। बाहर की चेष्टा भी अभ्यासवश, ऐसी होनी चाहिए, होती रहेगी और भीतर भगवान के विराजने का सुन्दर स्थान निर्मित होता रहेगा। पर *यदि साधन में आदर बुद्धि नहीं रहेगी तो फिर वह साधना तोते के पाठ की तरह ही रहेगी।*

      जहाँ हमने निश्चय कर लिया कि हमें तो अपनी परमार्थ-साधना को सबसे अधिक आदर का स्थान देना है कि बस, भगवान की कृपा ही--भगवान की अनन्त अपरिसीम कृपा ही अहैतुकी कृपा ही शेष सब काम कर देगी। विश्वास करें, हमको फिर आगे कुछ भी करना नहीं पड़ेगा,भगवान की कृपा से सब कुछ अपने आप होकर ही रहेगा। हमने अभी अनुभव ही नहीं किया कि भगवान की कृपा कैसी अद्भुत वस्तु होती है। इसलिए हमारी आँखों में कभी-कभी दुख के आँसू ही आ जाते हैं।

    हमें यह चाहिए कि हम निश्चय कर लें कि जो भी साधना हम करेंगे, उसे मन लगाकर करेंगे,सबसे अधिक आदर उसी को देंगे और भगवान की कृपा का आश्रय कर भारी-से-भारी दुख के अवसर पर आँसू ना बहा कर भगवान की और देखेंगे। फिर हम देखें क्या होता है। जिस क्षण इस निश्चय के साथ साधना के पथ पर भगवत कृपा के भरोसे पूरे उत्साह में भरकर पहला कदम बढ़ाया कि भगवत्कृपा का परिचय हमें मिलकर ही रहेगा। ऐसा इसलिए कि करुणावरुणालय भगवान हमारे साथ ही हैं, अनन्त अपरिसीम शक्ति लिए हुए हमारी सहायता के लिए तैयार खड़े हैं,उन्हें पूरा-पूरा पता है सभी बातों का और वे हमारे अपने-से-अपने हैं। खुशामद के टट्टू नहीं हैं, जो प्रतीक्षा करें कि *'यह मेरी खुशामद करें तभी मैं इसकी सहायता करूँगा।'* वह तो हमें अपने में मिला लेना चाह रहे हैं और अपनी परम सुखमय,शान्तिमय गोद में बिठा लेना चाह रहै हैं। हमने साधना में मन लगाया इसका अर्थ यह हुआ कि हमने उनकी ओर चलना आरम्भ कर दिया है और उनकी कृपा की ओर उन्मुख हुए, इसका अर्थ हुआ कि हमने निराश होकर उनकी सहायता प्राप्त करने के लिए अपनी भुजा फैला दी। बस,यही तो अपेक्षित है। यह हुआ कि भगवान सामने आए। *यह केवल भावुकता की बात नहीं है, यह सत्य का सत्य है।* कोई भी यह करके इस सत्य को प्रत्यक्ष अनुभव कर सकता है।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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