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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

               *२२*

*यह नियम ले लें कि विश्वरूप भगवान की, अपने प्रभु की अपने आप की वञ्चना नहीं करेंगे*

       असली साधक की स्थिति बड़ी ही विचित्र होती है। सच्चाई उसके कण-कण में भरी होती है। वह महासिद्धों की नकल नहीं करता--न वाणी में, न मन में। वह तो अपने लक्ष्य की ओर सम्पूर्ण शक्ति बटोर कर, प्राणों का सम्पूर्ण उत्साह लेकर, अपने जीवन की साधना-प्रणाली के पथ पर निरन्तर दौड़ता रहता है। उसे अवकाश कहाँ है कि वह दूसरों का गुण-दोष देखता फिरे।

       सच्चे परमार्थिक साधक की अपने पार्थिव शरीर से, अपनी उस मल-मूत्र की थैली से विरक्ति बढ़ती चली जा रही है ; क्योंकि असली साधक--परमार्थ--साधक को चाहे वह ज्ञान की साधना करता हो अथवा भक्ति की साधना करता हो, दोनों ही स्थितियों में उसे यह दिखने लग ही जाता है कि यह पार्थिव देह मल-मूत्र की थैली तो मैं नहीं हूँ, इससे मैं कोई भी वस्तु हूँ। किसी भी सम्प्रदाय के सिद्धान्त मानने वाला वह क्यों ना हो, उसे अपने पार्थिव शरीर से कम या अधिक मात्रा में विरक्ति होने ही लगेगी। ऐसा इसलिए होता है कि सभी सम्प्रदाय के सिद्धान्त संकेत करते हैं एक ही सत्य की ओर, एक ही भगवान की ओर। *सभी साधनाएँ--यदि वे शास्त्र सम्मत हो अथवा किसी भी महासिद्ध के द्वारा परिचालित हो अथवा मूलतः किसी महासिद्ध संत से परिचालित हुई हो तो भी आपको पहुँचा देगी वहीं*, एक ही भगवान के पास और भगवान की दिशा में सच्चाई के साथ चलने का पहला कदम बढ़ाते ही सत्य की यह किरण हमारे पर पड़ने ही लगेगी कि हम वास्तव में हैं कौन ?

   आँख बंद रहने के कारण हम उस किरण की अनुभूति तुरन्त ना कर सके, यह बात हो सकती है किंतु जैसे-जैसे कदम भगवान की और बढ़ता जाएगा वैसे-वैसे यह प्रतीति अवश्य-अवश्य होने लगेगी कि हम इससे भिन्न वस्तु है।
 
   कोई कहे मैं तो वर्षों से साधना कर रहा हूँ ? मुझे फिर जीवन में ऐसा अनुभव क्यों नहीं होता ? इसका उत्तर यह है कि *आपके द्वारा तोते की रटन्त-विद्या की साधना हो रही है ; किंतु आप घबराइए मत, तर्क मत कीजिए इस रटन्त-विद्या की साधना करते चले जाइए, लकीर ही पीटते चले जाइए। एक-ना-एक दिन यह रटन्त-विद्या की साधना भी,परमार्थ की लकीर पीटने की साधना भी, सच्ची होकर रहेगी, सर्वथा सर्वांश में और आपको भगवान से मिला कर ही छोड़ेगी।* हाँ, यदि हम यह नियम ले लें कि विश्वरूप भगवान को, अपने प्रभु को, अपने आप को ही बिल्कुल नहीं ठगेंगे, उनकी वञ्चना नहीं करेंगे तो यह पूर्ण निश्चित है कि हम अत्यधिक शीघ्रता से कृतार्थ हो जायँगे, कृत्यकृत्य हो जायँगे।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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