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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

             *२४*

*जगत के भोगों को बटोरना छोड़कर अपना मुँह भगवान की ओर कर लें*

   सोना जितना तपाया जाता है,उतनी ही अधिक उसकी उज्जवलता बढ़ती चली जाती है,उसकी शोभा निखरती चली जाती है। वैसे ही हम विपत्ति आने की आग में जितना अधिक तपते चले जायँगे, उतना ही अधिक हमारे भीतर जो भगवान का दिया हुआ तेज है, वह प्रकट होता जायगा। हमारी निर्मलता का सौंदर्य सबकी आँखों को आकर्षित करने लगेगा। किंतु हमें घबराहट होती है। विपत्ति की आशंका से हमारी नींद उड़ जाती है। विपत्ति तो आयेगी पीछे और आएगी कि नहीं आएगी तो किस रूप में--भारी या हल्की बन कर आएगी--यह तो सब पीछे की बातें हैं। हम तो विपत्ति की आशंका मात्र से ही अधमरे से हो जाते हैं। ऐसा क्यों होता है ?  इसलिए कि जगत के रचे-पचे रहकर यहीं इसी जगत के भोगों में हम निरन्तर सुख ढूँढ़ रहे हैं। *पर यदि हम असली दृष्टि को अपना सकते-- 'हमको किधर जाना है' उसको याद कर सकते तो प्रत्येक विपत्ति भारी-से-भारी विपत्ति हमारे लिए स्वागत की वस्तु बन जाती। विपत्ति की आशंका हमारे मन में उल्लास का, नवीन साहस का संचार कर देती।*

      किंतु अभी कुछ भी बिगड़ा नहीं है। सुबह का भूला यदि शाम को भी घर पहुँच जाय, अथवा शाम को भी घर की ओर जाने वाली सड़क पर घर की ओर मुँह करके दौड चले तो बस काम हो गया। वह तो घर पहुँच गया और यदि सूर्य छिप गया हैं तो भी एक घड़ी रात जाते-ना-जाते वह घर पहुँच ही जायगा ; क्योंकि *एक रक्षक उसके साथ छिपा हुआ निरन्तर चल रहा था, चल रहा है। जहाँ आवश्यकता होगी वहीं वह उसे रोशनी दिखा देगा, अब आगे गड्ढे में गिरने से बचा लेगा, जंगली जानवरों को उस पर हमला नहीं करने देगा, दौड़ने के कारण जब उसे प्यास लगेगी तो उसे बड़ा ही सुखद ठंडा पानी पिला देगा और थकान बढ़ जाने पर जरा-सा उसे छू देगा तथा इतने में ही उसकी सारी थकावट दूर होकर उसमें नवीन स्फूर्ति नवीन बल आ जायगा।*

     ठीक ऐसे ही, अभी *हमारे पास थोड़ा सा समय बच गया है। जगत के भोगों को बटोरना छोड़ कर भगवान की ओर मुँह कर ले,जो साधना संत-शास्त्र बताते हैं, उस पर चल पड़े तेजी से दौड़ पडे ; तो सूरज छिप भी गया तो अंधेरा होते- ना-होते भगवान हमें मिल जायँगे। जरूरत होते ही आवश्यकता पर प्रकाश में मिल जायगा, किसी भी पाप की गर्त में गिरने से बचा लिए जायँगे। हमें हानि पहुँचाने वाले हमारे पास फटक तक नहीं सकेंगे। कोई सा दुख साधन के सम्बन्ध को लेकर--होते ही हमें एक अद्भुत शान्ति का अनुभव करा दिया जायगा और जब साधन-पथ पर आगे बढ़ने में असमर्थता का अनुभव करने लगेंगे, तो उसी क्षण एक प्रेम स्पर्श की अनुभूति करा दी जाएगी और हमें नया ओज, नई ताकत आ जायगी।*

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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