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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
*२८*
*भगवान की रूचि जैसी प्रतीत हो हम आन्तरिक उल्लास से स्वागत करें*
संतो की बाहरी चेष्टा को, चेष्टा के सच्चे अर्थ को समझ लेना आसान काम नहीं है। मन शुद्ध हुए बिना अटकल-पच्चूपने का निर्णय प्राय: गलत ही होता है। और कहीं हम उसकी नकल करने चलें--तो सब समय नकल करना तो सम्मव ही नहीं है और यदि आगे-पीछे सोचे बिना कभी साहस बटोरकर बैठें--तब आगे चलकर, अथवा तुरन्त ही प्राय: पछताना पडता है। इसलिये सावधान रहना चाहिये।
एक संत थे। नदी पार रहे थे, नाव से। नदी का प्रवाह बहुत चौडा था। जब नाव ठीक बीच में आयी तो मल्लाह चिल्ला उठा--'राम ही बचावें, बहुत जोर का तूफान आ रहा है!' धारा बडी तेज थी, अपनी पूरी शक्ति लगाकर मल्लाह डाँड खे रहा था। थोडी ही देर में तूफन आ गया, अभी सैकडों गज दूर थी नाव किनारे से। संत के अतिरिक्त पन्द्रह-बीस यात्री और थे उस नाव पर। तूफान का वेग बढता ही गया ; मल्लाह की शक्ति समाप्त-सी होने लगी डाँड खेते-खेते। पुकार उठा मल्लाह--'नाव डूबती दीख रही है, भगवान् को याद कर कीजिए आपलोग ; अब वे ही बचा सकते हैं।' डरके मारे सभी पुकारने लगे भगवान् को, किंतु वे संत तो बडे ही विचित्र निकले। उन्होंने क्या किया कि अपना कमण्डलु उठाया और नदी में से जल भर-भरकर नाव में डालने लगे--एक,दो,तीन,चार,पाँच,छ: बस, डालते ही जा रहे थे। सबको अपनी जान की पडी थी। 'त्राहि, त्राहि, नाथ ! ' सभी पुकार रहे थे। संत की ओर देखकर भी यात्री उन्हें इस चेष्टा से रोकने से रहे। मल्लाह से नहीं रहा गया। संतों का भक्त होने पर भी वह बोल उठा--'महाराज ! नाव में पानी डाल-डालकर और जल्दी इसे क्यों डुबाना चाह रहे हो ? पर कौन सुने, संत ने तो अपनी ओर से और भी शीघ्रता से पानी डालना जारी रक्खा। दो-तीन मिनट बीतते-न-बीतते मल्लाह चिल्ला उठा--'महाराजजी! भगवान् की कृपा तो ऐसी दीखने लगी है कि नाव किनारे लग सकती है' किंतु आप तो इसमें पानी भरकर डुबोने पर ही तुले हो।' *'हैं, ऐसी बात है'*--कहकर संत ने अब नाव के भीतर जो पानी डाल चुके थे, उसे बाहर कमण्डलु में भर-भरकर फैंकने लगे। पसीने से लथपथ हो रहे थे, पर भीतर का पानी अब बाहर फैंकते ही जा रहे थे। लोगों ने समझा--'संत पागल है।'
आखिर नाव किनारे लग ही गयी। यात्री भी उतरे। मल्लाह श्रद्धालु था। किसी भी संत महात्मा से उसने उतराई ली ही नहीं थी। गरीबों को वह यों ही पार कर देता था। याचना तक उसने नहीं की थी किसी से भी उतराई की उसने अपने जीवन भर। लोग जो देते थे, उसी से उसका जीवन चलता था। अस्तु! उसके मन में आया संत पागल होंगे, किंतु नाव तो पार लगी है इनकी उपस्थिति के कारण। उसने डाँड फेककर संत के चरण पकड लिये और पूछ बैठा--'महाराज ! आपने ऐसा क्यों किया ? पहले तो पानी भीतर डाल रहे थे, फिर बाहर डारने लगे।' संत हँसे ओर बोले--"देखो, मेरी नकल तो मत करना और जो मैं कह रहा हूँ, उसे समझने की चेष्टा करना। तुमने कहा--'नाव डूब रही है।' तुम्हारी बात सुनकर मेरे मन में आया कि 'प्रभु की इच्छा है कि नाव डूब जाय, फिर मेरे लिये क्या कर्तव्य है ? नाव डूबे या बचे, इससे मेरे लिये कुछ बनता-बिगडता नहीं, किंतु मेरा तो कर्तव्य यही है कि उनके--प्रभु के परम मंगलमय विधान में मेरे द्वारा सहयोग का दान हो जाय। बस, मैंने कमण्डलु उठाया और पानी डालने लगा--दूसरे शब्दों में मेरा प्रयास नाव को डुबाने की दिशा में रहा, या हुआ, या दीखा। और फिर जैसे ही तुमने यह बात कही कि 'नाव के बचने की आशा है' बस, उसी क्षण मेरा प्रयास नाव को बचाने की दिशा में चल पडा--यह जानकर कि 'प्रभु नाव को बचाना चाह रहे हैं।' बस, प्रभु की मंगलमयी इच्छामें अपनी इच्छा मिला दिया करो। इसका अर्थ तुम मत मान लेना कि कोई मरता हुआ दीखे तो वैद्य के घर से लाकर उसे जहर खिला दो। इसका अर्थ इतना ही है कि *'भगवान् की रुचि तुम्हें जेसी प्रतीत हो, उसका तुम आन्तरिक उल्लास से स्वागत करो।'* तुम जिस दिन सच्चे संत बन जाओगे, उस दिन तो तुम्हारे अन्दर कोई संकल्प ही नहीं रहेगा, कोई कामना ही नहीं रहेगी ; तुम्हारे द्वारा स्वाभाविक परम मंगलमयी चेष्टा ही निरन्तर होती रहेगी। उससे पहले तुम्हें चाहिये कि जो भी फलरूप तुम्हें प्राप्त हो, उसका आन्तरिक उल्लास से स्वागत करो। *प्राणों का उल्लास लेकर मन-ही-मन पुकार उठो--'प्रभो! तुम्हारी मंगलमयी इच्छा पूर्ण हो।'* सारांश यह है कि तुम छोटी बातों के लिये तो करना ही क्या है, अपनी, अपने साथियों की मृत्यु की सम्भावना दीखने पर भी व्यवहारिक जगत् में उससे बचने-बचाने के लिये सात्विक उपायों का आश्रय तो ले लो, पर भयभीत मत होओ ; अपितु परम उल्लास के साथ मृत्यु का स्वागत करना सीखो--'मृत्यु के स्वरूप में भगवान ही आ रहे हैं, तुम्हारा मंगल करने के लिये'--इसे इतने उल्लास से अपने जीवन में मूर्त्त कर लो मानो मृत्यु को तुम नियन्त्रित कर रहे हो, मेरी तरह डूबती हुई नाव में पानी डालने की भाँति।"
इतना कहकर संत चले गये। इस कथा से हमें यह सीखना चाहिये कि *हम जिन्हें संत मानते हों, उनकी चेष्टा में गुण-दोष न देखकर, भूलकर भी उनकी नकल न करके उनकी सात्विक आज्ञाओं के पालन में जुटे रहें,* तभी संत का असली संग हमारे द्वारा होगा।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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