29

*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

         *२९*

*भगवान की यश-कथा के श्रवण का अद्भुत प्रभाव हमारे जीवन में क्यों नहीं होता विश्लेषण और निदान*

            असली संत की कोई बात किसी दिन किसी क्षण मन में उतर जाती है उस पर पर्वत की तरह अचल विश्वास हो जाता है और जीवन के उस साँचे में ढलते देर नहीं लगती और यह हुआ कि भगवान तो उसका स्वागत करने के लिए पहले से ही तैयार खड़े रहते हैं यह व्यक्ति देखते-देखते ही निहाल हो जाता है कृतार्थ हो जाता है। 
           
       पढ़ना-लिखना बुरा नहीं है पढ़-लिख कर विवेक का उपयोग करना ही चाहिए पढ़ लिख कर सत्साहित्य का अनुशीलन करके जीवन को आगे बढ़ाने में भगवान की ओर मोड़ने में जागरूक होना चाहिए किंतु जो पढ़ाई-लिखाई जो विवेक जो साहित्य हमारी सरलता का हनन करके हमें पद पद पर संशयालू बना देता है संत जगत के प्रति अनास्था उत्पन्न करा देता है संपूर्ण संत जगत हमें ढोंगीओं से ही भरा दिखने लगता है वैसी पढ़ाई-लिखाई वैसा विवेक वैसा सत्साहित्य तो जनसाधारण का कल्याण करने से रहा मस्तिष्क-प्रधान और हृदय-प्रधान बस ये ही तो दो वर्ग जनसाधारण के बनते हैं इन्हीं को परमार्थ में हम बुद्धि का साधक और विश्वासमार्ग का साधक कहकर पुकारते हैं।

       बहुधा प्रश्न होते हैं--असली संत के मुँह से निकली हुई भगवत्कृपा को सुनने पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है उसका कैसा अद्भुत प्रभाव पड़ना चाहिए और जैसा प्रभाव पड़ना चाहिए वैसा श्रोता पर क्यों नहीं पड़ता और यदि पढ़ता भी है तो वह स्थाई क्यों नहीं होता इन प्रश्नों का सीधा उत्तर यह है कि भगवान की कथा को सुनने का प्रभाव तो व्यक्त होकर ही रहेगा संत के मुँह से निकली हुई भगवद्-यश कथा अपना जादू दिखलाकर ही रहेगी।  भगवत्कथा सुनने का प्रभाव एक बार ही सुनने का प्रभाव यह होता है कि फिर संसार इस रूप में नहीं रह जायगा घर द्वार सब छूट जायगा। 'हमारे सम्बन्धीजन रोते-बिलखते रह जायँगे और फिर हम उन्हें नहीं मिलेंगे हम कपड़ा रंग कर साधु सन्यासी ही बन जायँगे।' यह मतलब नहीं है ; किंतु यह अवश्य है कि यह संसार मन से तो सचमुच-सचमुच निकल ही जायगा। फिर हम पर असर ही नहीं पड़ेगा इस संसार के किसी उतार-चढ़ाव का। अभी तो हमारी यह दशा है कि क्षुद्र-से कारण भी क्षण-क्षण हमारे मन का नक्शा पलटते रहते हैं और फिर भी हम कहते हैं कि हमें रामायण की कथा भागवत की कथा से बढ़कर कोई अधिक प्रिय वस्तु है ही नहीं यह *आत्मवञ्चना* है यदि हम आत्मशोधन करें तो हमें स्वयं पता लग जाएगा कि इसे 'आत्मवञ्चना' कहना सोलह आना ठीक है कि नहीं। 
             भगवत्कथा के इस महात्म्य को जानकर ध्यान में रखकर इस पर ध्यान देते हुए यदि हम कहीं कथा सुनने जायँगे तो एक दो बार ही जाने की जरूरत होगी फिर तो जीवन भर भगवान की और ऐसा मुडेगा कि हम स्वयं ही दंग रह जायँगे। अतिश्योक्ति नहीं है, कोई करके देखना चाहे तो साहस बटोर कर देख ले सकते हैं। किंतु *सोडा वाटर के जोश की तरह साज ना बटोरें, लहराते हुए समुद्र की तरह साहस लेकर आगे कदम बढ़ाये।* समुद्र वही रहता है, लहरा उठता है बड़े वेग से, किनारा ऊँचा रहने पर टकराता है, उससे बार-बार घंटों तक और फिर मानो थककर पीछे की ओर हट जाता है। किंतु कुछ ही घंटों के लिए ही पीछे हटता है। 'वह तो आयगा ही, उसी दिन ही एक निश्चित अवधि के अंतर में अवश्य आएगा-- किनारे को मानो डुबा देने के लिये।' ऐसा साहस लेकर जायँ--पीछे पछताने की मनोवृति को सर्वदा सदा के लिए जलाञ्जलि देकर, ठंडे पड़ जाने की आदत को आग में जलाकर।

         *            *            *
 अच्छी बात कहना-सुनना भगवान् की कथा सुनना--बिल्कुल ही प्रिय ना लगने पर भी बहुत-बहुत मंगलकारी है। 'आत्मवञ्चना' की बात तो ऊपर लिखी हुयी है, इसका अर्थ इतना ही है कि यदि सचमुच भगवान की कथा हमें सबसे अधिक प्रिय लगती होती तो हमें यह पद भी अपने अंदर चरितार्थ होते अवश्य दिखता--
 
*यों मन कबहूँ तुमहिं न लाग्यौ।*
*ज्यौं छल छाँडि निरंतर रहत विषय अनुराग्यौ।।*
*ज्यौं चातई पर नारि, सुने पातक प्रपंच घर-घर के।*
*त्यौं न साधु सुरसरितरंग निरमलगुन-गन रघुबर के।।*

'हाय रे!  मेरा मन तुममें नहीं लगा। प्रभो! जैसे यह कपट छोड़कर विषयों में निरंतर रचा-बचा रहता है वैसे नहीं लगा। नाथ ! पर स्त्री की ओर जैसी आँखें बराबर चली जाती हैं, गाँव की मलिन-चर्चा सुनने में इतना रस आता है कि छोड़ने का मन ही नहीं करता--वैसे कभी भी महात्माओं के दर्शन के लिए मेरी आँखें नहीं ललचायीं, कभी भी भगवान् की गुणवाली गंगा की धारा की तरह, गंगा की निर्मल लहरों की भाँति निर्मल करने वाले भगवान के यश, भगवान् की कथा की और कानों में उन्माद पैदा करने वाली उत्कंण्ठा नहीं जागी।' 

          यह पद गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज जी की रचना है जिन्हें रामचरितमानस जैसे अद्वितीय सुन्दर महान कल्याणकारी ग्रंथ की रचना अवधी भाषा में की है। तो क्या महासिद्ध भगवत्प्राप्त संत नहीं थे वह जो ऐसा कह गए हैं अपने लिए ? वे परम सिद्ध भगवत्प्राप्त संत *अवश्य अवश्य अवश्य* थे ; किंतु भगवत्प्राप्त संत जिन्होंने भक्ति-मार्ग की साधना से महासिद्ध की स्थिति में अवस्थित ही प्राप्त की है, भगवत्भक्ति से सिद्ध हुए हैं, उनकी स्थिति, अनुभूति, उनके अन्त:करण की कथन मात्र के लिए बची हुई है बुद्धि-मन-इन्द्रियों की अवस्था कैसी है--यह वही जानते हैं। तो क्या ज्ञान-मार्ग की साधना से महा सिद्ध हुए संत की स्थिति कुछ भिन्न होती है ? नहीं, ऐसी बात बिल्कुल नहीं है। किंतु यह ऐसी पहेली है, जिसे हम सुलझा सकेंगे सचमुच महासिद्धि प्राप्त कर लेने पर ही। एक महात्मा से किसी ने इसी प्रकार का प्रश्न किया था।  उसके उत्तर में उन्होंने कहा था *महात्माओं का गज अपने दोषों को नापने का--जनसाधारण की अपेक्षा दूसरा होता है। अपने अंदर किसी भी दोष की छाया की छाया भी उन्हें स्वयं को कहीं दिख जाए तो वह इतना विशाल-बड़ा दिखने लगता है कि बस उसकी कोई इयत्ता नहीं। असली महात्मा में कोई दोष ना होने पर भी उन्हें क्यों दोष दिखता है। अपने अंदर--महात्मा बने बिना हम उसकी कल्पना तक कभी कर नहीं सकते। अतएव हमें तो इसी से प्रयोजन रखना चाहिए कि खूब कथा सुनें भगवान की, खूब सत्संग की बातें सुनें, पर साथ ही  आत्मशोधन भी करते रहें।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

Comments

Popular posts from this blog

92

90

157